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हम क्यों भाग रहे इस बॉलीवुड के पीछे?

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सब क्यों भाग रहे…भागते को अपने पीछे भागने को 70 के दशक में जन्मे हम 80 के दशक तक आते आते फिल्मो के शौक़ीन हो चूके थे…अच्छा तब फिल्मे इतनी आसानी से उपलब्ध न थी….3-4 साल लगते थे एक फ़िल्म को बनने में फिर होती थी प्रदर्शित…..और प्रदर्शित फ़िल्म भी इतनी आसानी से देखने को न मिलती…. एक दो दिन पहले show के टिकट खुद जा कर लाते पापा फिर सिनेमाहाल तक जाने के साधन कि मारा मारी तब कहीं एक फ़िल्म देखते थे….. इसीलिए शायद दर्शक के लिए ये फ़िल्म अलग महत्व रखती थी और इसी बात को समझते हुए फ़िल्म कि पूरी टीम मनोरंजन परोसती थी…. पर अब क्या हुआ? आसान चीज़ों के होने के बाद भी क्यों कर ये फिल्मे मनोरंजन से बढ़कर विवाद क्यों हो गयी हैं? जब बात 70 के दशक से शुरु कि तो राजा हरिश्चंद्र से शुरुआत हुई आलम आरा पहली बोलती फ़िल्म से बढ़ा ये सफ़र आज भटकाव पर क्यों हैं? देखा जाए तो सिनेमा में ऐसा क्या हैं कि तमाशा, नौटंकी, रंगमंच आदि मनोरंजन के स्रोत जब दम तोड़ चूके हैं तो क्यों कर सिनेमा ही लोगों के दिमाग पर छाया हैं? जाहिर सी बात हैं कि एक साथ एक से अधिक इन्द्रियों को प्रभावित करने वाला सिनेमा मस्तिष्क पर सीधा असर डालता हैं तो क...

mercury

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#mercury मौन सबसे सशक्त चीख है ये फ़िल्म की स्क्रिप्ट को ही नही के ऐसी घटनाओं के दर्द को भी बयान करती जहां कितनी जिंदगियां चुप हो गयी और कोई सुनवाई नही हुई।हर घटना के पीछे एक छोटी सी मानवी भूल ही वजह होती पर सोचिए ये गलती न होती तो कितने लोग हंसते खेलते अपने जीवन में होते । कोडाइकनाल में एक थर्मोमीटर बनाने वाली एक कंपनी एक चूक की वजह से कितने कामगार अपने सामान्य जीवन से दूर हो गए फ़िल्म की स्क्रिप्ट वहीं से निकलती है और फ़िल्म का नाम भी इसी लिए मरक्यूरी रखा गया है । फ़िल्म अप्रैल 2018 रिलीज़ है जिसे साइलेंट फ़िल्म कह प्रमोट किया गया पर ये साइलेंट फ़िल्म नही है क्योंकि साउंड इफ़ेक्ट भरपूर है फ़िल्म में इस लिए ये एक संवाद रहित फ़िल्म है क्योंकि ये एक हॉरर मूवी है इसलिए साउंड इफ़ेक्ट बहुत जरूरी था वरना फ़िल्म बेकार होती।याद होगा आपको अमला कमल हासन अभिनीत पुष्पक एक मूक फ़िल्म थी जिसमे कोई बैकग्राउंड म्यूजिक भी नही था । भारतीय सिनेमा की पहली मूक फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र को मैंने देखा नही इसलिए उसका नही बोल सकती । पांच मूक और बघिर दोस्त एक फॉर्म हाउस पर बहुत दिन बाद मिलते है जिसमे एक जोड़ा भी होता है ।ये प...

dark

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#Darkwebseries  #netflix “The end is the beginning , the beginning is the end”  Dark is right now one of the most talked scifi , Honestly this review is a little tough for me cause this story is full of twists and to write a spoiler free review is difficult.  But, I will do the job for you .  So this whole series is based on two most brain twisting paradoxes , the bootstrap paradox and the time paradox and it’s important for me to tell you about these two.  The bootstrap paradox is about how when an information travels back in time loses its original existence , for example let’s imagine that you decide to travel back in time to meet Shakespeare and at that time Shakespeare hasn't written one his most popular play “Hamlet” . You decide to take a copy of Hamlet with you . Everything goes planned, you travel back in time, have a little chat with Shakespeare but accidentally drop Hamlet there . Shakespeare decides to copy and publish it . Then who wrote hamlet? It ...

आज के कलाकार अजय अतुल

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#आजकेकलाकार वैसे बॉलीवुड रियल टैलेंट को गुमनाम करने में काफी सफल रहता है । मेरे आज के कलाकार है संगीतकार जोड़ी अजय अतुल । चलिये इनके बारे में बताने से पहले कुछ गीत लिखती यहां अग्निपथ -चिकनी चमेली जीरो-मेरे नाम तू Pk Brothers-सपन जहां धड़क लेकिन मैंने अजय अतुल को जाना मराठी फिल्म सैराट के गीतों से ।खासकर सैराट झालो जी से।यूं तो लजय अतुल 2000 से मराठी सिनेमा में एक्टिव है पर इन्हें असली पहचान मराठी फिल्म जोगवा से 2008 में मिली।और बॉलीवुड में अग्निपथ से। अजय अतुल न केवल संगीतकार है बल्कि दोनों अच्छे गायक भी।अप्सरा आली ,झिंगात आदि गीतों में अजय अतुल ने अपनी ही आवाज़ दी है।अजय अतुल का संगीत कर्णप्रिय और सादगी से भरा होता है लेकिन फिर भी बादशाह,हनी सिंह और बहुत रीमिक्स कर खुद को संगीतकार कहने वाले संगीतकर के नाम पे कलंक की भीड़ में अजय अतुल अभी चमक नही पाए उतना जितने के वो हकदार।एक बार नॉटी सैयां ,पानी पानी हो गयी जैसे फूहड़ गीत के आगे अजय अतुल के संगीतबद्ध गीत सपन जहां ,अभी मुझ में कहीं या मेरे नाम तू को सुन कर देखिए। अजय अतुल जी को शुभकामनाएं

आज के कलाकार तृप्ति डिमरी

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अगर आप इंस्टा reels देखते या बनाते है  तो आजकल एक song trending पर है रखूँ छुपा कर तुझको ओ लैला, मांगू ज़माने से तुझ क़ो मैं लैला कब से मैं तेरा हूँ कब से तू मेरी लैला गीत के बोल काफी अच्छे इम्तियाज़ अली प्रोडक्शन में बनी है ये फ़िल्म लैला मजनू 2018 कि रिलीज है....... स्क्रिप्ट लैला मजनू के इश्क कि है पर आज के समय में कश्मीर कि वादियों से लंदन तक पहुँचती...... गीत संगीत अच्छा.... नवोदित जोड़ी थी इसमें तृप्ति डिमरी और अविनाश तिवारी कि 28 वर्षीय तृप्ति डिमरी ने अपना कैरियर  श्रेयस तालपडे दवरा निर्देशित फ़िल्म पोस्टर बॉयज 2017 में शुरू किया था..... उसके बाद इन्हे इम्तियाज़ अली कि लैला मजनू मिली........ फ़िल्म में मजनू अविनाश से ज्यादा क्रेडिट तृप्ति ले गयी......2साल  के गैप के बाद तृप्ति netflix original हॉरर ड्रामा बुलबुल में दिखी...... ये फ़िल्म काफ़ी खास थी तृप्ति के लिए क्यूंकि तृप्ति इसमें main lead में थी वो भी सधे हुए क्लाकारों के साथ पौली दाम, परमब्रत और rahul बोस के साथ....... इस फ़िल्म से तृप्ति फ़िल्म क्रिटिक्स के दिमाग़ पर छा गयी और उस साल का फिल्मफेयर OTT अवार्ड for best act...

Ammu

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#ammu        Bell बजाओ….. घरेलू हिंसा अगर इस शब्द क़ो लूँ तो कोई भी यहाँ इससे अनिभिज्ञ न होगा भले ही वो इसका शिकार हुआ या न हुआ हो पर प्रत्यक्ष दर्शी जरूर रहा होगा यानि कि इस शब्द का नाम लेते ही आपके जेहन में कोई न कोई वास्तविक उदाहरण जरूर आता होगा। इसको अपने जीवन से मैं बाद में जोड़ती पहले यहाँ बात कर लेते 19अक्टूबर क़ो प्राइम पर प्रदर्शित हुई तेलगु मूल कि फ़िल्म अम्मू फ़िल्म कि। यूँ तो फ़िल्म कि स्क्रिप्ट आलिया भट्ट कि रिलीज फ़िल्म डार्लिंग्स जैसी पर एक तुलना करने पर दोनों में वहीँ अंतर नज़र आएगा जो बॉलीवुड और टॉलीवुड में आता और यहाँ मैं तुलनात्मक बात ही रखूंगी। फ़िल्म कि कहानी शुरू होती है अमूधा उर्फ़ अम्मू नाम कि लड़की कि शादी से…अम्मू कि शादी इंस्पेक्टर रवि से होती है जिसे अम्मू बचपन से जानती थी पर ये प्रेम विवाह नहीं है…. अम्मू एक नव विवाहिता के सपने लिए अपने पति के घर आती है पर उसे न पाता था कि ये सपने उसके अपने नहीं।धीरे धीरे उसका विवाहित जीवन अभिशाप बनने लगता है जहाँ बस रोज मारना और दैहिक शोषण जैसी यातना ही रह जाती है……अम्मू ये सब किसी से बता न पाए इसलिए उसका पुलिस प...

आजके कलाकार निकितन धीर

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थंगाबली थांगबली  कुछ याद आया  जी रोहित शेट्टी की फ़िल्म चेन्नई एक्सप्रेस में दीपिका के मंगेतर थंगा बली यानी निकितन धीर । निकितिन धीर या निकितन धीर BR चोपड़ा कृत महाभारत के कर्ण यानी पंकज धीर के सुपुत्र है और निकितन ने अपना कैरियर जोधा अकबर में अकबर के बहनोई सैफुद्दीन के नेगटिव रोल से शुरू किया था । 6 फुट 4इंच लंबे निकितन की अदाकारी से पहले उनका शारीरिक सौष्ठव , रौबदार आवाज़ आपको प्रभवित करता है और शायद इसीलिए बॉलीवुड के किसी भी हैंडसम एक्टर से ज्यादा हैंडसम और आकर्षक देह के बाद भी निकितन को नकारात्मक भूमिका मिलती है पर शेरशाह फ़िल्म मेजर अजय जस्सी की भूमिका में निकितन काफी जंचे है। बहुत ज्यादा शारीरिक सौष्ठव पर धयान देते देते कई बार चेहरे पर एक रूखापन आ जाता जो बॉलीवुड में multitalented एक्टर की पदवी से आपको दूर कर देता है शायद यही वजह है निकितन के 99% गुणों पर हावी हो उन्हें एक खलनायक के रूप में स्थापित कर रही है पर खलनायक का भी अपना महत्व और स्थान है । निकितन ने जोधा अकबर से शुरू कर सफर मिशन इस्तानबुल ,ready, हाउसफुल3,फ्रीकी अली,दबंग,चेन्नई एक्सप्रेस,शेरशाह और सूर्यवंशी जैसी कई...

आज के कलाकार किशोर

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#kishore #kantaramovie #आजकेकलाकार कांतरा.... प्रांतीय स्तर पर कन्नड़ भाषा में बनी फ़िल्म जिसने प्रदर्शन के मात्र 30 दिन के भीतर अंतर राष्ट्रीय स्तर ऐसी प्रशिद्धि पायी कि 2022 कि RRR क़ो भी पीछे छोड़ दिया..... फ़िल्म के नायक, निर्माता और लेखक ऋषभ शेट्टी कि तो सब बात कर रहे पर फ़िल्म का एक और किरदार है जो कि काबिले तारीफ है... वो है forest अफसर मुरली जिस पर्दे पर निभाया है कन्नड़, तेलगु, तमिल और मलयालम फिल्मो के चरित्र अभिनेता किशोर कुमार G या सिर्फ किशोर यूँ तो किशोर नें कन्नड़ साहित्य में मास्टर डिग्री के बाद फैशन डिज़ाइनिंग क़ो अपना व्यवसाय बनाया पर साथ ही थिएटर से भी जुड़े रहें...... एक फ़िल्म के सेट ड्रेस का काम संभालते 2 किशोर क़ो अपनी पहली फ़िल्म कांति 2004 में मिली..... कन्नड़ भाषा कि इस फ़िल्म में किशोर के किरदार beera क़ो काफी सराहा गया और उन्हें प्रांतीय स्तर पर इस किरदार के लिए अवार्ड भी मिला... बस फिर क्या था किशोर नें अपनी काबिलियत के बल पर इस सफऱ क़ो जो अंजाम दिया कि आज कई भाषा में काम करने के बाद बॉलीवुड कि पहली फ़िल्म रेड कॉलर कर रहे। वैसे किशोर OTT webseries के जरिये हिन्दी सीरीज से 2 सा...

इतेफ़ाक

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#इतेफाक  मैं इस फिल्म को फिल्म के ट्विस्ट से शुरू करुँगी ...फिल्म का ट्विस्ट एक वाक्य में " एक क्रिस्चियन औरत की बॉडी दफनाई नही गयी जलाई क्यूँ गयी ?...इत्तेफाक रीमेक कहूँ ..दूसरा भाग कहूँ क्या कहूँ ...खैर इस इत्तेफाक को १९६९ वाली इत्तेफाक से मत जोड़िये ..ये बिलकुल वैसे है ही जैसे "ओह माय गॉड " का एक विस्तृत वर्णन "PK" को कहना ......दोनों इत्तेफाक बिलकुल इत्तेफाक नही रखती एक दुसरे से . फिल्म की कहानी शुरू होती है विक्रम सेठी (सिद्धार्थ मल्होत्रा ) के पुलिस कस्टडी से भागने से ....विक्रम एक प्रशिद्ध लेखक है और जिस पर अपनी ही बीवी के खून का इलज़ाम है ....विक्रम बरसात की एक रात पुलिस से बचते हुए एक्सीडेंट का शिकार हो एक अपार्टमेंट में छिपने जाते हैं जहाँ वो माया (सोनाक्षी सिन्हा ) के घर में घुस जाता है .....विक्रम ,माया के घर में कुछ अजीब सा देखता है ......विक्रम ,माया का एक दुसरे पर शक और आरोप चलता रहता है की तभी वहां विक्रम को ढूंढते हुए क्राइम ब्रांच के देव (अक्षय खन्ना) पहुँचते हैं ......देव को माया के घर में माया के पति शेखर  की लाश मिलती है ....माया हत्या आरोपी ...

maja maa

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#मज़ा मा "कैसे? कैसे किया माँ.. तुमने झूठ बोला और lie डिटेक्टर पर पकड़ी भी न गयी " "मैंने कोई झूठ न बोला उनके सवाल ही गलत थे…. वो शयाद ये पूछते कि क्या आपने किसि औरत से प्रेम किया हैँ to मैं ख़ुशी ख़ुशी फेल हों जाती टेस्ट में पर उन्होंने पूछा कि क्या किसी औरत संग सेक्स किया तो वो नहीं किया…. प्रेम और शारीरिक आकर्षण का अंतर नहीं जानते न " प्राइम पर स्ट्रीम माधुरी दीक्षित द्वारा अभिनित एक low बजट फैमिली ड्रामा टाइप मूवी…ज़ब review लिखूँगी तब शयाद लोग जानेंगे 😊😊 खैर फ़िल्म पर आते…. समलैंगिक संबंधों पर आधारित फ़िल्म फायर के बाद ये कौन से number कि लेस्बियन स्क्रिप्ट पर बनी फ़िल्म हैँ ये न पता पर पहली बार इस विषय पर कोई फ़िल्म मिली जो इस तरह के संबंध पर घिन नहीं तरस और प्प्रश्नों को छोड़ती कि क्या हैँ समलैंगिक होना, क्या होता हैँ ज़ब एक औरत अपनी सेक्सुलिटी के ले बोलती हैँ, कहाँ से ऐसी भावनायें आती, क्या ये पीढ़ी दर पीढ़ी जाने वाली बीमारी हैँ, क्यों एक स्त्री एक स्त्री को ही पसंद करने लगती हैँ?? अभी कुछ दिन पहले ही मैंने लिखा कि जब आप खुद को कहना या जीना शुरू करते वहीं से विद्रोही ह...

मेरी_बेलन_टाइट_और_मैं

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वेलेंटाइन की सुबह चाय के लिए टेबल पर पेपर सुड़कते पति ने कनखियों से झांकते हुए पत्नी से कहा " सुनो इधर आओ " पत्नी ममता के जैसा मुह बनाते हुए आयी बोली "क्या है" पति ने रोमांटिक होते हुए पूरी बत्तीसी दिखा कर कहा "हैप्पी वैलेंटाइन डे ।एक किस मिलेगी क्या ?  "उनहूँ ये क्या है मुह में लहसुन की खेती की हो क्या ?इतनी बास "पति का इश्क़ का भूत लगभग बेहोश होते होते चीखा पत्नी ने भी माया बहन जी वाला रूप इखितियार करते हुए कहा " भूख लगेगी तो इंसान अचार चटनी संग पराठा खायेगा ।भूख वैलेंटाइन फलन टाइन नही जानती समझे । "उफ़ ।अरे यार स्प्रे मिंट तो छिड़क लेती मुह में या फिनायल से ही गरारा कर लेती ।कोई तो कम होता ,अब नाश्ता लाओ ।मैं भी मूड का और सत्यानाश नाश्ता खा कर करूँ दो जल्दी। फटाक धम्म ,जैसे किसी ने पड़ोसी देश पर बम फ़ेका हो बीवी ने इस अंदाज़ में टेबल पर प्लेट रखी "लो ठुंसो " "ये क्या है ?अचार पराठा दही ,,,,,अरे कुछ और भी बना दिया करो प्लेट में भी खुद को परोस दिया हैं" पति ने बुझे अंदाज़ में कहा "हाँ भाई जब गले पड़ी हो आशा तो कहाँ मिले बिपा...

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आत्माएं होती है कि नही ? उनका अस्तित्व क्या सच में है? है कि वो मन का वहम है? ये सब किस की जिज्ञासा का विषय नही और कुछ लोगो के लिए तो ये कौतूहल का विषय स्तर तक जिसे पागलपन कहते है वहाँ तक है । कुछ इसी को समेटते हुए 2011 में प्रदर्शित फ़िल्म 404 की स्क्रिप्ट है। कई फिल्मों को देख लगता इस लेवल तक भारतीय निर्देशक जा पाते है ? वहम और मानसिक रोग के बीच के एक बहुत महीन अंतर को ले ये स्क्रिप्ट लिखी गयी और अंत  उफ्फ्फ फ़िल्म शुरू होती है एक मेडिकल कॉलेज के न्यू सेशन से । फर्स्ट ईयर स्टूडेंट अभिमन्यु (राजवीर अरोड़ा) और उसके बैच मैट की सीनियर स्टूडेंट कृष (इमदाद शाह पुत्र डरे हुए दूसरे शाह) और उसके batchmate सीनियर बुरी वाली रैगिंग लेते है ।  रैगिंग के खेल से ऊब राजवीर होस्टल का रूम बदलने का फैसला लेता है और उस कमरे 404 को चुनता है जो तीन साल से बंद पड़ा है क्योंकि उसमें तीन वर्ष पूर्व रोहित नाम के स्टूडेंट ने आत्महत्या कर ली थी औरइसलिए बाकी स्टूडेंट  उस कमरे से दूर रहते थे क्योंकि उन्हें वहां रोहित की आत्मा नज़र आती है । होस्टल प्रबंधन से अभिमन्यु को वो रूम दिलवाने में प्रोफेसर अनिरुद्...

nandi hills

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18अगस्त को अपने जन्मस्थल प्रयागराज को इसीलिए तजा ताकि घुमककड़ी कि जा सके…अब सब बोलेंगे कि क्या वहाँ कुछ नहीं क्या…. तो होता यूँ हैँ कि घर का खाना चाहे जितना स्वास्थ्य के लिए अच्छा पर रोज़ खा खा क़र बोर हों जाते न तो बस वहीँ यहाँ समझ लो तो जिसने जीवन 40 बसंत सिर्फ एक ही प्रान्त में बिता दिए उसके लिए कोई भी नई जगह "आओ राधा रानी " ही लगती सौभाग्य मिला कि बिटिया नें दक्षिण भारत को शिक्षा के लिए चुना बस यहीं से जिम्मेदारी संग यात्रा आरम्भ का अवसर मिला फिर सब व्यवस्थित करते करते 43दिनों बाद बैंगलोर  के नये ठिकाने से मात्र 33km कि दुरी पर स्थित nandi hills जाने का अवसर मिला आते जाते इस कि छवि दिखती हैँ दूर से पर इनके आस पास होने का अवसर आज मिला भारी बारिश में कही जाने का सोचते सोचते कब ड्राइव क़र के चोटी पर पहुँच गए पता न चला……और फिर ऐसा लगा कि हम स्वर्ग में हैँ (dont worry स्वर्गवासी न हुए 🤣🤣🤣) बैंगलोर के बाह्य छेत्र से जुडा chikkaballapur district में nandi hills आता जिसको देखने का सबसे सही समय हैँ सुबह सूर्योदय के समय या सूर्यास्त के समय इसीलिए शायद दो विपरीत दिशा व्यू point भी है...

chup :revenge of the artist

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chup:revenge of the artist जबरदस्त जबरदस्त जबरदस्त "किसने तुझे अधिकार दिया की तू किसी फिल्म को ख़राब और अच्छी बता सके    फिल्म रिव्यु का मतलब होता है फिल्म को महसूस कारना " चुप फ़िल्म : एक दिन कार ड्राइव करते हुए FM  पर एक गीत को काफी प्रोमिसिंग बताते हुए RJ ने अगला chart buster  बताया। गीत था चुप फिल्म का गया गया दिल ये गया। गीत अच्छा लगा घर आकर मूवी सर्च की और डिटेल्स निकाली और २५ बार गीत गया गया को सुन डाली। जब फिल्म का ट्रेलर देखा तो समझ गयी एक तरह की रोमांटिक मर्डर मिस्ट्री है लेकिन जब गीत को सुना बार बार सुन तो समझ गयी कि बल्कि ने कुछ नहीं बहुत खास फिल्म बनाइ है क्यूंकि गीत में ही फिल्म कि कहानी है बस वही ढूंढ पायेगा जो दिमाग से लेखक हो और दिल से फिल्म कि स्क्रिप्ट को महसूस करता हो कुछ मेरी तरह या यूँ कहूं कि फिल्म शायद मेरे जैसे फिल्म रिव्यु देने वालों और सिने लवर के दर्द को ले लिखी गयी मतलब कि बस एक शब्द ब्रिलियंट बोले तो ब्रिलियंट। फिल्म चुप कि बात करने से पहले फिल्म के निर्माता निर्देशक कि बात करते है तो निर्माता निर्देशक आर बालकृष्ण यानि आर बल्कि। आर बल्कि क...

अर्जुन रेड्डी vs कबीर सिंह

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Arjun reddy vs kabir singh  सबसे पहली बात "हद से ज्यादा सही होना गलत होने वाला attitude कैसे दे सकता है ? अर्जुन रेड्डी या कबीर सिंह यही बताते की हद से ज्यादा सही लोग ही पापा नाटेकर मेरा मतलब है कि नाना पाटेकर होते हैं गज़ब यार मैं इन दोनों ही फ़िल्म की बात नही करना चाहती थी पर करना जरूरी लगा क्योंकि दोनों के देखने के बाद ये महसूस किया कि रियल लाइफ स्टोरी के नाम पर किसी की सुहाग रात को लाइव कर देना कोई मनोरंजन नही है । दोनो ही फ़िल्म के द्वारा संदीप वेंगा  जो भी कहना चाहते है वो फ़िल्म #संजू के घपा घप से कम अश्लील नही है । संजू में भी नशा ,लड़कियां और नासमझी ।इनदोनो में भी यही तो अंतर का स्तर क्या रखें।  हगा हुआ ही खाद बनाता है पर दोनो खाद्य नही होता ,संजू और अर्जुन रेड्डी में यही अंतर है और कबीर सिंह तो जो नाले में बह जाता है न वो वेस्ट मैटेरियल है । दोनो स्क्रिप्ट ही जुड़वा है बस 5 मिनट बाद वाला जुड़वा नयन नक्श से खराब है । दोनो में ही लीड मेल करैक्टर मेडिकल स्टूडेंट फिर सर्जन है पर जिंदगी बचाने के एक भी तरीके को बताने की जगह जिंदगी का बल्ब कैसे शॉट सर्किट कर बुझाया जाए ये बिल...

ब्रह्मास्त्र

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"काजल कि स्याही से लिखी हैँ तूने जाने कितनो कि लव  स्टोरियाँ " जब ब्रह्मास्त्र का ये गीत रिलीज हुआ तभी समझ जाना चाहिए था कि ये फ़िल्म क्या होगी? क्या यहाँ ये न हो सकता था "काजल कि स्याह रातों से छिनी हैँ तूने कितनो कि नींदे गोरिया " ठीक इस तरह ब्रह्मास्त्र शब्द का प्रयोग करने से पहले थोड़ा और हिन्दू धर्म पौराणिकता पर रिसर्च क़र लेते तो बेशक फ़िल्म इसे बहुत ही उमदा  बनती। फ़िल्म कि कहानी कहाँ से लिया इसका कोई ओर छोर न मिला रहा…. अयन मुख़र्जी के स्क्रिप्ट पर काम से मुझसे धन्नू शाह वाली कविता याद आ गयी…. अगर किसी को पता हैँ तो कमेंट क़र जरूर बताये वरना मेरे जेहन कि छोटी अमृता को जितना याद वो बताती…. धन्नू शाह कविता लिखने के अलावा कुछ करते न थे इससे गुस्सा हो उनकी पत्नी नें रातको घर से बाहर क़र दिया.. अब धन्नू शाह रात कि यात्रा में चोर, कुत्ते आदि सबकी हरकत को कविता में लिखते चले जिसको पढ़ते पढ़ते वो राजा के दरबार पहुंचे और राजा नें उनकी अजब सी कविता पर इनाम दिया जिसे ले धन्नू शाह ख़ुशी 2घर आगये तो बस भाई अयन मुख़र्जी नें यही किया.। हमारे ग्रंथो से असुर,देव, ब्रह्मास्त्र अस्त्र आदि...

आज के कलाकार:तिलोत्तमा शोमे

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#आजकेकलाकार #तिलोत्तमाशोमे  दबंग फ़िल्म का एक डायलाग था थप्पड़ से नहीं प्यार से डर लगता हैँ साहेब... कुछ इसी डायलॉग को आधार बना कर 2018 में एक फ़िल्म आयी थी sir.... Sir कहानी थी रत्ना कामवाली बाई की जिसके अपने काम के प्रति समर्पण को देख उसके मालिक को उससे प्रेम हो जाता हैँ पर रत्ना उसे ठुकरा देती हैँ ये कह क़र प्रेम से आत्मसम्मान नहीं मिलेगा जो काम से मिलता हैँ और उसके मालिक भी उसकी भावना का सम्मान क़र रत्ना के फैशन डिज़ाइनर बनने के सपने को पूरा करते हैँ फ़िल्म बेहद खूबसूरत हैँ और उससे ज्यादा खूबसूरत रत्ना बनी अदाकारा तिलोत्मा शोमे की अदाकारी तिलोत्मा कलकत्ता में एक आर्मी ऑफिसर के घर जन्मी हैँ और is वजह से उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया हैँ... लेडी श्रीराम कॉलेज दिल्ली से पढ़ने के साथ 2 तिलोत्तमा नें रंगमंच की ट्रैंनिंग ली हैँ... कुछ दिन न्यूयॉर्क में रहने के बाद तिलोत्मा नें मुंबई को चुना और यहीं से उनकी अदकारी का सफर शुरू हुआ... तिलोत्मा नें क्या बच्चन के भतीजे से विवाह किया हैँ पर इसका उनके कैरियर के चढ़ाने से कोई मतलब नहीं। तिलोत्तमा की पहली फ़िल्म हैँ मानसून वेडिंग उसके बाद से तिलोत्त...

aadai

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#aadai Aadai एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है वस्त्र फ़िल्म 200 वर्ष पूर्व ,दक्षिण भारत की प्रथा से शुरू जहां नंगेइ नामक स्त्री ने विद्रोह किया था स्तनों पर लगने वाले कर के लिए ।प्रथा थी कि आदिवासी स्त्रियों को (शायद) स्तनों को ढकने पर कर भुगतान करना होता था ।नंगेइ ने इसका विरोध करते हुए स्तनों को ढकना शुरू किया जिस पर राजा के सिपाही उसे गिरफ्तार करने आते और दुर्व्यहार कर उसे नग्न करते तब नंगेइ अपने स्तनों को ही हंसिये से काट देती और दर्द और अधिक रक्त स्राव की वजह से मृत्यु को प्राप्त होती लेकिन मरते मरते वो आंदोलन शुरू करती जो स्त्रियों  को प्रेरित करता अपने शील और लज्जा के लिए खड़े होने जे लिए । साधारण शब्दों में इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट ने जिस तरह से  feminism के नाम पर ली जा रही स्वतंता पर प्रहार किया है वो देखने लायक । फ़िल्म बताती की स्त्री की स्वतंत्रता शराब ,सिगरेट देर रात बाहर ,घूमना ,आपत्तिजनक कपड़े पहनने से नही नापी जाती न ही स्त्री ये सब कर स्त्री स्वतंत्र नही होती । कामिनी(आमला पॉल) एक बहुत उन्मुक्त विचारों वाली लड़की है जो एक चैनल के प्रैंक शो की witty vj या एंकर है।अपने जन...

darlings

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Darlings बंद करो बंद करो….. कृपा क़र के स्त्री के प्रति हो रही घरेलू हिंसा को डार्क कॉमेडी में दिखा कर आपराधिक हल न दिखाएँ……कृपा करें वैसे डार्लिंग्स फ़िल्म का बॉयकॉट ट्विटर पर रेड अंडरवियर के बराबर हो रहा हैँ और ये विरोध स्त्री प्रमुख स्क्रिप्ट में पुरुष पर घरेलू हिंसा को दिखाए जाने के चलते हो रहा हैँ जोकि पक्षपात पूर्ण विरोध हैँ…ज़ब फ़िल्म में माध्यतर के पहले  स्त्री पर हिंसा दिखाया तब ठीक लेकिन माध्यतर के बाद उसी पुरुष को स्त्री कुछ थप्पड़ मार देती तो वो गलत 😡😡😡 कहाँ से लाते ये ट्विटर पर ट्रेंड चलाने वाले दोहरापन? फ़िल्म कि निर्देशिका का ग्राफ काफ़ी अच्छा नहीं हैँ….2006 कि जॉन कि जिन्दा मूवी कि कहानी को मौत दी,2016 में फाॅर्स 2 को काफ़ी ब्लट  ओपनिंग दी, ऐश्वर्या और राजकुमर राव अभिनीत फन्ने खान तो आज तक अपना अस्तित्व ढूंढ़ रही हैँ…। फ़िल्म कि कहानी शुरू होती मुंबई के चाल  के जोड़े से बदरूनिशा (आलिया ) और हमजा (विजय वर्मा ) से….. दोनों प्रेम विवाह किये थे चार साल पहले…. और चार साल में दोनों के बीच कुछ बढ़ा हैँ तो मार पीट….. हमजा शराबी और एक तरह का मनोरोगी हैँ जो शयद शराब के नशे स...

आज के कलाकार

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#JimSarbh  आजकल बात रॉकेट्री फ़िल्म की हो रही है और डब्बे में जाते जाते इस फ़िल्म ने प्रदर्शन के बाद जो झंडे गाड़े है उसके लिए तो पहले लेखक,निर्देशक और अभिनेता आर माधवन को शुभकामनाएं और बधाई  रॉकेट्री से मुझे sonyliv ott की राकेट बॉयज webseries की याद आयी .....होमी भाभा और विक्रम साराभाई के योगदानों को दिखाती ये webseries अभी भी गुमनाम है ।वजह ......दर्शक लटके झटके और एडल्ट कंटेंट में ज्यादा प्रेरणादायक नही पचा पाते .....खैर सबको क्या कहूँ मैंने भी 6 महीने पहले देख कर इस पर एक शब्द न लिखा । राकेट बॉयज की स्क्रिप्ट और सादगी के साथ साथ उसमैं मुख्य भूमिका वाले कलाकारों का योगदान भी है जिसमे सबसे पहले नाम आएगा ...होमिभाभा बने जिम sarbh का   वैसे तो जिम महाराष्ट्र में जन्मे  पारसी भारतीय है पर उनको देख के लगता को भारतीय और ब्रिटिश मूल के मातापिता के पुत्र हो जैसे  ..... जिम का जन्म और स्कूलिंग मुम्बई में ही हुई है फिर एटलांटा में हायर एजुकेशन।जिम 2000 के दशक से रंगमंच से जुड़े है ......कई सफल नाटकों के बाद जिम को बॉलीवुड में ब्रेक मिला 2016 में प्रदर्शित...

bhool bhauliyaa 2

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समझ में नही आ रहा था कहाँ से शुरू करूँ रिव्यु तो अभी हाल ही मैं हुआ ताज़ा विवाद बॉलीवुड और दक्षिण की फिल्मों की भाषा का मुद्दा याद आया तो सोचा क्यों भूल भूलैया की बात यहीं से शुरू करें। अब इसके लिए जरूरी की भूल भूलैया की बात करें तो पहली वाली भूल भूलैया किसने बनाई थी ? प्रियदर्शन ने जोकि 80 के दशक से मलायलम ,तेलगु और तमिल सिनेमा का जानामाना नाम है निर्देशन में ( प्रियदर्शन भूतपूर्व क्रिकेटर भी है जिन्होंने आंख की खराबी के चलते क्रिकेट खेलना छोड़ दिया था ) भूलभुलैया की स्क्रिप्ट कहाँ से आई ? 2007 प्रदर्शित भूल भूलैया 1993 की मलायलम साइकोलोजिकल हॉरर manichitrathazhu की रीमेक थी । इस प्लाट को ले खुद दक्षिण भारतीय सिनेमा में 5 से ज्यादा रीमेक बनि और हिट भी हुई तो बॉलीवुड तब बड़ा सफाई से निकल आया कि स्क्रिप्ट अछि थी ,अक्षय और विद्या ने गज़ब एक्टिंग की (ott होता या आदित्य फ़िल्म या goldmine फिल्म्स होते तो पहले ही पोल पट्टी खुल जाती ।) फिर शुरू हुआ पुरानी हिट फिल्म के नाम भुनाने का दौर यानी सीक्वल बनाना या स्पिन ऑफ़ बनाना या नाम और संगीत को ले शीट करना तो भैया भूल भूलैया को ले अनीस बज़्मी न...

orphan

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हॉलीवुड हॉरर या सस्पेंस मूवी का अपना ही एक फ्लेवर होता है ,वो फ्लेवर बॉलीवुड में कुछ ही फिल्म में मिलता है जैसे "एक थी डायन" में,.....कल रात जागने के चलते काफी दिन से देखने को सोच रही थी जिसे वो फिल्म देखी "orphan"।। ।। Jaume collet sara दवरा निर्देशित "orphan" एक एडल्ट सस्पेंस थिरलर है ।एक पति पत्नी जिनकी की दो संताने है 12 साल का बेटा  और 7 की मूक बघिर बेटी ।तीसरी संतान के जन्म के समय ही खो देते हैं जिसके चलते पत्नी अवसाद ग्रसित हो जाती है ।इसके वो एक बच्चा गोद लेना चाहते है ।अनाथ आश्रम में उन्हें 9 वर्षीय रशिया मूल की esther नाम की लड़की पसंद आती है जिसका की पूरा परिवार आग लगने से मर चुका था । Esther के आते ही घर में अचानक ही अजीब घटनाएं घटित होने लगती है साथ साथ पति पत्नी के संबंध और बिगड़ जाते हैं ।इसी बीच अनाथ आश्रम की नन जोकि esther का अतीत जानती है उनकी हत्या हो जाती है ।परिवार के साथ घट रही घटनाओं को जानने के लिये पत्नी एक मानसिक रोगियों के अस्पताल से संपर्क करती है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है पूरा परिवार एक रहस्य के साथ बर्बाद हो चूका होताहै ...

जगजीत सिंह जी

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ये लेख मैंने जगजीत सिंह जी की मृत्यु के बाद लिखा था  ।इस लेख मेरी लिखने की क्षमता को।लोगों के सामने लाया ।जैसे जगजीत जी दुबारा नही जन्म ले सकते वैसे ही मैं ऐसा कुछ दुबारा नही लिख सकती। नमन #जगजीत_सिंह_जन्मदिन_विशेष "चिट्ठी न कोई सन्देश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए "    दर्द की गहराइयों से उभरती आवाज़ जो आज हमेशा के लिए चुप हो गयी .......चुप हो गयी एक दर्द भरी दास्तान भी ..................शायद  ही कोई जानता होगा कि कि अपनी आवाज़ और दूसरों के दर्द से रिश्ता कायम करने वाले जगजीत सिंह का खुद दर्द से रिश्ता कितना गहरा था I जगजीत सिंह  लोगों के लिए एक मखमली आवाज़ के मालिक, एक गायक कि तरह ही थे जिनकी आवाज़ में लोग खुद के दर्द को ढूंढते थे ,पर जगजीत जी इससे परे भी एक शख्शियत थे जिसने अपने दर्द को ही नही औरों के दुःख को भी समेटा था I                             श्री गंगानगर ,राजस्थान में जन्मे जगजीत सिंह का हमसे आपसे सम्बन्ध तभी बन गया जब जगजीत सिंह मुंबई अपने भाग्य को आजमाने आये ,ये दौर था १९६५ का I...

हर अमृता अमृता नहीं होती

हर अमृता की किस्मत में इमरोज़ नही होते  इसलिए हर अमृता अमृता नही होती  सुनो ------ सोच लो एक बार फिर  इमरोज़ की अमृता का साहिर भी होगा  दायें हाथ की ऊँगली से तुम्हारी पीठ पर  मैं बार बार साहिर का नाम लिखूंगी  तुम्हारे हाथ से चाय के प्याले थामते हुए  अनायास ही कह बैठूंगी " साहिर ..... तुम भी न ....... मेरी उँगलियों में तुम्हारी उंगलियों के पाश की जगह  अध् बुझी सिगरेट होगी जिसके धुएं से साहिर लिखूंगी  कोई दुरी न होगी कमरे के दो कोनो में  पर मैं कोई दुरी न तय कर सकुंगी दिलो के कोने में , फिर से कहती हूँ कि सोच लो  हर अमृता का इमरोज़ नही होता इसी लिए हर अमृता ,अमृता नही होती

सड़ांध

#कथा सड़ान्ध कहना सही होगा दुर्गन्ध से ज्यादा सड़ांध .....जहां सब कुछरुक सा जाए वहां की सीलन की गंध ....दुर्गन्ध ......इंसानो के न्याय की पहली सीढ़ी "थाना"....जानवर भी न आना चाहे जहां …....माटी की महक नही सीलन की बदबू .....दीवारें अपराध की बातों को सुन सुन बदरंग …...गुनाहगारों के चेहरों सी कई रंग वाली ......नारायण का पहला दिन किसी गाँव के थाने में .....टोपी ठीक करते हुए साहेब के आने के इंतज़ार में तभी पहियों की आवाज़ ने बता दरोगा जी आ गए ..... ये गांव बीहड़ था जाति व्यवस्था को परिभाषित करता विकास को दरकिनार करता .….नारायण की हवलदार की नौकरी में एक दाग से उभर रहा ये थाना  "सलाम साहब" दरोगा जी थोड़ा घूरते हुए 'तुम्ही बदली पर आए हो " "जी साहब " "तो पता नही चला क्या थाने में आते ही हमारे नथुने  में समोसा चाय की महक न गयी और ये क्या बाहर साले रो रहे  क्या मजमा लगा है आधा गांव आ के क्या हल्ला कर रहा है ? "साहब...गलत काम हो गया है ....पूरा गावं उसी पर छाती पीट रहा है" "गांव के थाने में नए हो कि नौकरी में नए या दुनिया में नए बे ....अपने साथ स...

thereader

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#thereader रीडर फ़िल्म को कितनी बार देखा ,कितनी बार लिखूंगी कहा पर कुछ लिख नही पाई वजह कि कुछ कभी इतना गहरा उतरता कि उसके साथ न्याय करने की हिम्मत न हो पाती है। द रीडर के संग मैं दो और भारतीय सिनेमा की फिल्मों का नाम लेना चाहूंगी ,एक तो BA pass दूसरी डर्टी पिक्चर ,वजह the reader फ़िल्म के दृश्य ,शील और अश्लील के बीच का अंतर या ये कहें अश्लील और पवित्र अश्लील के बीच का । हमारी निगाह में सोच में ये भरा है कि यौन संबंध गंदे होते,जंगली होते है और यौन संभंध होते है।36 साल की स्त्री और 15 साल के लड़के के शारीरिक सम्भन्धों के दृश्यों को मैं कभी सही नही कह सकती पर फ़िल्म के स्त्री पात्र ,छायांकन और भूमिका के आधार पर कहती कि आप केट विंसलेट और डेविड क्रोस के वो नग्न दृश्यों के बाद किसी तरह की उतेजना नही महसूस करेंगे जबकि आप डर्टी पिक्चर की विद्या बालन को अनावश्यक रूप से अपने शरीर का भौंडा प्रदर्शन करते हुए देख जरूर करेंगे ।BA pass की शिल्पा का कम उम्र के युवक को seduce करना जितना वाहियात लगा उतनी केट की नग्न देह नही (ये अलग बात है उन पुरुषों की निगाह का कुछ नही किया जा सकता जिनको स्तनपान कराती माँ भ...