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माएँ

माएँ कल निकाली जाएंगी माएँ सीलन और बदबू से भरे अंधेरे कमरों से  उन पर जमी अकेलेपन और बेचारगी की धूल को  साफ किया जाएगा किसी मलमल के कपड़े से , छिपायेगी औलादें उनके चेहरे पर जमी अनुभव की झुर्रियाँ अपनी नासमझी की कमाई से और बेमतलब के रिश्तों की आड़ में , बिखेरा जाएगा उनका वजूद "तुम मेरी जिम्मेदारी हो माँ " बोलकर , फेसबुक की लाइक ,इंस्टा के फॉलोवर के भीड़ में उसे एक दिन और अकेला छोड़ देंगी उनकी निशानियां फिर बताने आएंगे आर्चीज़ के कार्ड ,पैराडाइस के केक ,तनिष्क के हीरे कि प्यार और अपनेपन का मोल कैसे चुकाते है, भर जाएगी माएँ उस एक और आत्मग्लानि के बोझ से  कि शायद वो अपने हाथों को जला कर भी रोटियों में वो स्वाद न दे पाई  कि शायद वो नही दे पाई रातों को जागकर भी अपनेपन की परिभाषा , हर तरफ happy mothers day के रंग में खुद को बेरंग मानकर माएँ फिर चुन लेती है 365 दिनों का अज्ञातवास , फिर खोलती है सीलन वाले संदूक के अकेलेपन को और गुम हो जाती है उस मातृ दिवस के इंतजार में जहां होंगी उसकी अपनी परछाइयाँ उसकी अपनी यादों संग उसके अपने अस्तित्व संग  नही पहुंचती किसी तक इन बन्द होते स...