सड़ांध
#कथा
सड़ान्ध कहना सही होगा दुर्गन्ध से ज्यादा सड़ांध .....जहां सब कुछरुक सा जाए वहां की सीलन की गंध ....दुर्गन्ध ......इंसानो के न्याय की पहली सीढ़ी "थाना"....जानवर भी न आना चाहे जहां …....माटी की महक नही सीलन की बदबू .....दीवारें अपराध की बातों को सुन सुन बदरंग …...गुनाहगारों के चेहरों सी कई रंग वाली ......नारायण का पहला दिन किसी गाँव के थाने में .....टोपी ठीक करते हुए साहेब के आने के इंतज़ार में तभी पहियों की आवाज़ ने बता दरोगा जी आ गए .....
ये गांव बीहड़ था जाति व्यवस्था को परिभाषित करता विकास को दरकिनार करता .….नारायण की हवलदार की नौकरी में एक दाग से उभर रहा ये थाना
"सलाम साहब"
दरोगा जी थोड़ा घूरते हुए 'तुम्ही बदली पर आए हो "
"जी साहब "
"तो पता नही चला क्या थाने में आते ही हमारे नथुने में समोसा चाय की महक न गयी और ये क्या बाहर साले रो रहे क्या मजमा लगा है आधा गांव आ के क्या हल्ला कर रहा है ?
"साहब...गलत काम हो गया है ....पूरा गावं उसी पर छाती पीट रहा है"
"गांव के थाने में नए हो कि नौकरी में नए या दुनिया में नए बे ....अपने साथ सही बात होने पर कौन चूतिया पुलिस दरोगा करता है ...हाँ ....एक दम ही @#$$& हो .....बताओ जल्दी से हुआ क्या है"
"साहाब .....साहब वो जगपतिया के छोटी बेटी के संग गलत हुआ ....गांव के ही लड़के ने गलत किया ....बहुत छोटी है "
"हरामी साला कोई और न मिली......क्या रपट लिखी दिखाओ ??....लड़की को शहर के हस्पताल तुम और एक कांस्टेबल लेके जाओ ...डॉक्टर का ब्यौरा ले के आओ।
क्या बे नारायण रपट की भाषा की माँ बहन कर दी । उम्र जब सात साल है तो कहाँ से बलात्कार लिखे हो ....पता नही क्या दुष्कर्म कुकर्म कहाँ लिखते हैं "
"साहब दिमाग सुन्न हो गया बच्ची की हालत देख ....माँ बाप भी बेहूदे .....तैयार न हुए बच्ची को कांस्टेबल के साथ हस्पताल भेजने को...गलती होगयी "
"कैसे पुलिस में आ गए .....मन्दिर में घन्टा बजा कर सफाई से लूटते भक्त लोग को .....डाल लो आदत .....हाड़ मांस को लोथड़े में देखनी की ,......कानो से खून निकालने वाली चीखों की ......हाथो से खून की गर्मी को छूने की .....पुलिस की नौकरी रोज़ी रोटी इन्ही पर बनतीहै ......दलित ???....जगपतिया दलित है ....अबे ये नया ठुमका लगा दिए नारायण तुम ......प्रेस का कोई था क्या ??क्योंकि अब हमारा काम तो दूसरी पार्टी वाले और मीडिया वाले करदेंगे ये रपट और दलित के आधार .....साला जैसे हरामियों की वासना भी दलित और आम लोग की लड़की के नाम पर जागती है .....मुँह क्या ताक रहे जाओ बच्ची को ले हस्पताल .....और यहाँ जो गंद किये गड़बड़ से लीपने दो हमे ...निकलो जल्दी .....और हाँ अगर लड़की का बाप न तैयार हो हस्पताल के लिए तो दो कान के नीचे देना ....साले शौच के लिए अकेले भेज देंगे .....बचाने के लिए बुद्धि बन्द कर लेंगे आंख की तरह"
"और तुम लोग खड़े क्या हो चाय समोसा क्या मेरा बाप लाएगा ???......ऐसे को भेजो जो एक कप चाय ज्यादा और चटनी भी फ्री में लाये और बाहर बैठे जगपतिया की रुदालियों को भी खदेड़ देना .....
थाने की सीलन की सड़ाँध कुछ ज्यादा तीव्र हो चली थी ।
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