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atrangi re

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#atrangi re पहला वाक्य फ़िल्म के खत्म होत्ते ही जो जेहन में आया वो ये था "जब कुछ न बन सका तो तमाशा बना दिया" अतरंगी रे फ़िल्म के साथ वही किया जो सेवन स्टार होटल करते अछि अच्छी सामग्री के बाद बहुत मेहनत दिखा थोड़ी सी डिश प्लेट में सर्व करते जिसे खा कर एक मिडिल क्लास यही बोलता" अबे ये तो लल्लन हलवाई का समोसा है जिसमे बस उसकी गंदी लुंगी का स्वाद नहीं है ।" धनुष,अक्षय ,ए आर रहमान इरशाद कामिल को ले कर भी वो कुछ न कर सके ।सैड भैरी सैड 😒😒😒 स्क्रिप्ट स्वामी,वो सात दिन ,हम दिल दे चुके सनम वाली है जिसे नया कुछ करने के नाम पर अतरंगी बना दिया जैसे दूल्हे को नए फैशन के नाम पर जोकर की वेशभूषा दे दो । फ़िल्म बिहार की पकड़ा शादी से शुरू जिसमे रिंकू सूर्यवंशी (सारा अली खान) 24वर्ष की होते होते 21 बार घर से भाग चुकी है वो भी एक अज्ञात प्रेमी के साथ।यहां  intro   में रिंकू अपने सरनेम को एक्सप्लेन करते हुए टूटी फूटी इंग्लिश में बताती है कि वो राजा राम की वंशज है । इसका यहाँ क्या काम भाई?🤔🤔🤔 खैर ,21 बार भागी रिंकू की नानी (सीमा बिस्वास) अज्ञात प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए पकड़ा शादी यान...

trance

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"हमसब कुछ भावनाओं संग रहते और हम लोगो को इन्ही भावनाओं के लिए ड्रग देंगे " "ड्रग? "यस ड्रग ......धर्म .....धार्मिक उन्माद" इंसान को बांटने की जो अचूक भावना है या यूं कहें कि इंसान को कमजोर करने की धर्म ....उसे अपने फायदे के लिए व्यवसाय बना ईश्वर का नाम दे दिया है इसी पर करार प्रहार है trance Trance..... शाब्दिक अर्थ एक मनोदशा जहां आपको अपने आस पास की अपनी कोई खबर नही होती ।इसी नाम के साथ है अनवर रशीद की मलयाली फ़िल्म trance जोकि feb 2020 में प्रदर्शित हुई है। आश्चर्य एक ज***** विषय और फ़िल्म गुमनाम ? IMdb की रेटिंग भी पावरफुल 7.3 तब भी ये फ़िल्म underrated है ।सबसे दुखद फहाद fassali की अदाकारी के बाद भी ये गुमनाम है । कहानी कन्याकुमारी के viju की है जो एक मोटिवेशनल सपीकर है एक बहुत साधरण जीवन और व्यक्तिव के साथ। अपने अतीत से भागता हुआ ,अपने मानसिक रोगी  भाई की परवरिश करता हुआ खुद ही को रोज़ मोटिवेट करता असफल मोटिवेशनल सपीकर ।अपने भाई की आत्महत्या के बाद viju खुद ही अवसाद में चला जाता है ।ऐसे में परिस्थितियां उसे दो बड़े व्यवसायी से मिलाती जो viju की मोटिवेशनल क्वालि...

मीनाक्षीसुंदरेश्वर

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सबसे पहले "south indian girls are best for marriage" अब पूछो why तो रुको जरा सब्र करो बताते है। मीनाक्षी सुंदरेश्वर फ़िल्म के प्रमुख पात्रों के नाम के साथ साथ मदुरै के मीनाक्षी अम्मन या मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर के आधार पर भी है ।मीनाक्षी मंदिर भगवान शिव के सुंदरेश्वर रूप और देवी पार्वती के मीनाक्षी अवतार के पाणिग्रहण संस्कार का प्रतीक है इसीलिए यहां विवाह करने का अपना महत्व है और फ़िल्म की शुरुवात भी यही से होती है । अभिमन्यु दासानी की आवाज़ सूत्रधार के रूप मंदिर के महत्व को बताते हुए मीनाक्षी सुंदरेश्वर प्रमुख पात्र के विवाह पर आती है ।यूं देखा जाए कहानी कुछ नही बाकी कहना चाहे तो नव विवाहित जोड़े के परिस्थिति के चलते लांग डिस्टेंस रिलेशनशिप में जाने की और frustrated होने की फिर मिलने की बात है बस। फ़िल्म मदुरै के दो परिवारों से शुरू हो वहीं खत्म हो जाती है ।कुछ नया नही हाँ पर जो मेरी तरह गांव शहर छोड़े हुए तमिलियन है उन्हें फ़िल्म की विशुद्ध तमिलियन परिवार की प्रतिदिन की जिंदगी,रीति रिवाज,वेशभूषा ,खान पान और पर्दे पर तमिलनाडु की हरियाली देखना अच्छा लगेगा। पर जो तमिलियन है और विदेश...

लुटेरा

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#lootera  ओ हेनरी ...इनकी कहानियां बचपन में "कथासागर" और "एक कहानी " में DD नेशनल पर देखा था I उम्मीद नही थी की ओ हेनरी की कहानी प्रेम को भी इतनी खूबसूरती से प्रदर्शित करेगी ...२०१३ में प्रदर्शित फिल्म "lootera "  कल देखि ...ओ हेनरी की काहानी "THE LAST LEAF" का आंशिक चित्रण ......lootera २०१३ की श्रेष्ठ फिल्मो आती है और ये मुझसे छूट गयी थी ?....lootera आज़ादी के बाद के समय की साधारण  सी लगने  वाली प्रेम कथा पर इस प्रेम कथा का होना और इसके नायक नायिका के प्रेम का होना एक आलग अनुभव सा है ........विक्रमादित्य मोटवानी दवरा निर्देशित "लूटेरा" इनकी दूसरी फिल्म है .....विक्रम अपनी पहली फिल्मक"उड़ान " से ही   अपनी काबिलियत दिखा चुके हैं ......निर्देशन एक दम सधा हुआ ... कहानी शुरू होती है १९५३ के गाँव मानिकपुर से ...एक जमीदार पिता की एकलौती बेटी पाखी (सोनाक्षी सिन्हा ) ,एक अपरिपक्व लेखिका ......ऐसे में एक पुरातव अन्वेषक वरुण श्रीवास्तव (रणवीर सिंह ) आता है ...वरुण जल्द ही पाखी  के पिता और पाखी के दिल में जगह बना लेता है ...अपने मित्र देव...

तलवार मूवी

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#तलवार मूवी "नूतन ...बाहर आओ ......लाश को पहचानना है ......पुलिस वाले उपर बुला रहे " "पंडित जी ने कहा है अस्थि कलश को अकेला नही छोड़ना है जबतक अस्थि  विसर्जन न हो "  "नूतन ......कलश गाड़ी में रख दो और बाहर आओ "  "नही ....मैं श्रुति को एक पल के लिए भी अकेला नही छोडूंगी ..कभी नही "  एक ऐसी डबल मर्डर मिस्ट्री जिसका हर सच सामने है ...हर पहलु देखा गया है फिर उससे जुड़ा फैसला क्यूँ नही स्पस्ट है ???क्या हुआ १५-१६ मई  २००८ की रात को नॉएडा के एक घर में की आज तक सब उस सच से अनजान है ?.ऐसे में एक सची घटना को स्क्रिप्ट में ढाल कर फिल्म बनाना अपने में ही जोखिम भरा काम  है ..... फिल्म कोई फैसला नही दे सकती सटीक की अपराधी कौन है ? फिल्म ये भी नही कह सकती की ये नही होना था फिर क्या होगा फिल्म में ? बिलकुल इसी सवाल के साथ मेरी तलवार फिल्म को देखने की उत्सुकता थी की आखिर क्या किस तरह से  आरुषि मर्डर मिस्ट्री को पेश किया होगा मेघना ने ? क्या अंत लिखा होगा विशाल ने ? .....सारे जवाब मिले इतनी खूबसूरती से मिले की मैंने आरुषि हेमराज मर्डर मिस्ट्री को बिलकुल अलग तरीके से ...

game over

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#gameover गेम ओवर की कहानी से पहले एक मेढक की कहानी सुनाऊँगी ।दो मेढक दूध के पतीले में गिर गए दीवारें चिकनी होने की वजह से दोनो प्रयास के बाद भी नही निकल पा रहे ।पहला मेढक हार मान कर सांस छोड़ कर दूध में डूब कर मर गया वही दूसरा मेढक लगातार हाथ पांव मारता रहा नतीजा ये हुआ कि उसके प्रयासों दूध मथ गया और झाग के सहारे वो ऊपर आ बच गया । सार ये की जिंदगी एक बार मिलती और कभी कभी खुद को उबारने के मौके भी एक बार ही मिलते ।तब इस दुनिया में कोई दूसरा आपका ख़ुदा नही होता आप खुद के ख़ुदा होते हैं। गर ये कहूँ कि मराठी सिनेमा की तरह तेलगु  सिनेमा भी बहुत कुछ अलग कर रहा तो गलत नही होगा या शायद ये पहले से ही स्तर लिए हुए था जिसे नेटफ्लिक्स और प्राइम जैसे प्लेटफार्म ने एक पहुंच दी है ।तेलगु और तमिल सिनेमा में भी एक से एक स्क्रिप्ट देखने को मिलती है । Game over ऐसी ही फ़िल्म है जो आपको सिनेमा घर में अपनी कुर्सी से बांध देती है आप नाखून चबाते हुए अब क्या होगा कहते रहते।मुझे ये अफसोस हुआ कि इसे फ़ोन पर देखा नाकि सिनेमा हॉल में 😔😔😔😔 फ़िल्म एक साथ कई विसंगतियों को लेकर चलती एकल नायिका संग यूँ कहे फ़िल्म नाय...

anthology films

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महामारी की दशाओं के चलते मल्टी प्लेक्स थिएटर सिनेमाघरों का जो हाल है वो किसी से अछूता नही । पहले तो भीड़ की वजह से इनसे लोगो को दूर करना पड़ा पर अब ये लोगो की खुद की रुचि से दूर हो गया जब OTT पर एक टिकट के खर्चे पर एक फ़िल्म कितने लोग देख सकते ,बार बार देख सकते और तो और कई देख सकते । ऐसे में OTT पर प्रोड्यूसर का प्रयोग धर्मी होना लाजमी है । इसे तरह के प्रयोग का नाम है anthology । Anthology को दर्शक के तौर पर समझाऊं तो एक फ़िल्म के समय में अलग अलग निर्देशकों की या कभी कभी एक ही निर्देशक की चार अलग अलग मुख्य किरदार वाली कहानियां जिनका ताना बाना आपस मे जुड़ा रहता या उन चार कहानियों का सब्जेक्ट कॉमन होता ।एक anthology फ़िल्म का एक ही विषय वस्तु एक ही होता जैसे एक anthology हॉरर है यानी चार अलग अलग हॉरर पर आधारित अलग अलग कहानियां या सोशल ड्रामा जैसे सुपर डीलक्स .....सुपर डीलक्स में चार अलग अलग किरदार अपनी परिस्थतियों से जूझते हुए एक दूसरे अंजान लेकिन इनको निर्देशक एक ही सूत्र से बांधता चार अनजान परिस्थतियों को एक दूसरे का पालनहार बना कर ।सुपर डीलक्स सोशल ड्रामा यानी चारो किरदार की सामाजिक दशा को ...

unbelievable

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#unbelievable #truestory  #realcrime #miniseries #thriller "बलात्कार ,बलात्कार होता है ....दिशा,देश बदल जाने पर भी बलात्कार से जुड़ी संकीर्ण सोच नही बदलती है" ऐसा ही कुछ दर्शाता है real crime based 2019 प्रदर्शित अमेरिकन मिनी सीरीज "unbelievable" ये दरसअल 2008 से 2011 के बीच वाशिंगटन में हुए युवा लड़कियों से रेप सीरियल क्राइम पर आधारित है जिसकी स्क्रिप्ट बेस्ड है मिलर और आर्मस्ट्रांग के आर्टिकल पर जिसे पुलतीज़र पुरस्कार भी मिला था। सीरीज शुरू होती है marie एडलर नाम की 17 वर्षीय अनाथ लड़की से जो एक रात अपने घर में ही रेप का शिकार होती है ।पुलिस marie के दोहरे व्यवहार और अपनी लापरवाही के चलते इस केस को एक फेक केस संमझ बन्द कर देती है जिसका परिणाम ये आता है कि अनाथ marie का जीवन अपने अतीत के चलते नरक था अब इस फेक रेप विक्टिम के दाग के साथ पूरी तरह से नरक हो जाता है । marie तो लगभग न्याय की उम्मीद खो चुकी थी लेकिन दो अलग अलग फीमेल detective  ग्रेस और karen के हाथ ऐसे ही रेप केस आने के बाद सभी कड़ियाँ जुड़ना शुरू होती है और अपराधी पकड़ा जाता है । शुरुवात में आपको लगेगा की आप को...

कपाल क्रिया

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शाम गहराने लगी ...डुबते सूरज संग लोगो की भीड़ भी शमशान से कम होने लगी ।चिता की आग भी लगभग ठंडी होने को ही थी तभी गहरी सोच में डूबे मयंक की तन्द्रा चिता से अस्थि निकालने वाली ने तोड़ी। "भैया जी भैया जी " "हम्म हाँ बोलिये " मयंक थोड़ा सकपता सा बोला  "भैया जी हिन्दू रीति रिवाज से दाह संस्कार हो रहा तो क्रिया बाकी रह गयी उसी के लिये बोल रहे" "क्रिया?.....अब क्या बाकी है अस्थि लेने के अलावा "मयंक ने झुंझलाते हुए कहा  "कपाल क्रिया …..चिता की आग बुझने से पहले पुत्र को मृतक की कपाल क्रिया करनी होती यानी कपाल को डंडे से छिन्न करना होता वार्ना मरने वाले को मुक्ति न मिलती " "क्या करना होगा ? कपाल को छिन्न क्या?"मयंक ने घबराते हुए पुछा "रुकिए हम करवा ही देते वरना कर्म कांड वाले हम को बोलेंगे पाप करवा दिए ….." शमशान की क्रिया करवाने वाले ने मयंक के हाथ में एक डंडा थमा दिया और बोला "इसे कसके पकड़े और चिता के कपाल को फोड़ना है एक प्रहार से ताकि आत्मा को मुक्ति मिले " "क्या" दबी सी चीख के संग मयंक बोला और उसके हाथों स...

house of death part 2

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भाग 2 "ये क्या मज़ाक है ?परेशान एक अजनबी से ये किस तरह का मज़ाक है ? अनिकेत दर्द और डर से चिल्लाया तभी कमरे में भयानक अंधेरा छा जाता है खुले दरवाज़े बन्द होने लगते और उन तीनों के हँसने  की डरावनी आवाज़ तेज़ होने लगती । अंधेरे में अनिकेत दरवाज़े की तरफ भागता है लेकिन दरवाजा बन्द होता ।कमरे में भयानक डरावनी आवाज़ें गहराने लगती जो जैसे कोई संदेश दे रही हो वो रहस्यमयी डरावनी आवाज़ तेज़ होती जा रही " तुम यहाँ खुद से नही आये हो तुम्हे मैंने बुलाया है अपने इस घर में जहां से तुम जा नही सकते .....नही नही जा सकते " वो डरावनी आवाज़ औरत की चीखती हुई गुम हो जाती है और अचानक कमरा फिर रोशनी से भर जाता है लेकिन ?? लेकिन ये क्या वो लड़की वो वृद्ध उसकी पत्नी कोई नही है कमरे और दरवाज़े खिड़कियां बन्द  अनिकेत बेतहाशा डर के साथ चिल्लाते हुए दरवाज़े की हैंडल को घुमाने लगता है "खोलो दरवाजा खोलो " तभी दरवाज़े के दूसरी तरफ पैरों की आवाज़ आनी शुरू होती ।अनिकेत चुप हो दरावाज़े से पीछे हटने लगता कि तभी दरवाज़ा खुल जाता है । खटक !!!! गलियारे में सिर्फ मोमबत्ती की रोशनी और रोने की आवाज़ जो दूसरे कमरे से आ रही...

house of death part 1

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House of death मनाली की बर्फीले सड़क पर जब रात का साया गहराता है तो एक अनजाना से भय चारों ओर फैलने लगता है।डर मौत का ....डर अनजाने सायों का ....उफ ये काली रात कितनी भयवाह होती है अपने अनसुलझे रहस्य लिए हुए कोहरे में गुम ये सुनसान सड़क और ये कार  घर्रर्ररर....घर्रर्ररर "उफ़्फ़ मनाली की बर्फीली सर्द रात और मेरी कार का ये नाटक" कार के इंजन  को स्टार्ट करने असफल कोशिश करते हुए अनिकेत झल्लाया "लगता है आज यही ठंड से मेरी कब्र बनेगी " गुस्से और नाकामी संग खुद से बात करते हुए अनिकेत कार से उतरा और खुद को सिमेटते हुए सड़क के किनारे किसी देवदूत के आने का इंतज़ार करने लगा खुद को गर्म करने के लिए सिगरेट का कश लेने की उम्मीद से जेब  टटोली पर नाकामी ही हाथ लगी  "Shit इसे भी न मिलना था अभी ...आज तो लगता है बस अपनी मौत का इंतज़ाम कर निकल हूँ" सर्द बर्फ़ीली रात में यूं फँसना अनिकेत के दिल और दिमाग पर हावी हो चुका था।सड़क के किनारे गाड़ी पार्क कर अनिकेत किसी मदद की उम्मीद में सड़क के ढलान वाले मोड़ की ओर बढ़ने लगा । दिमाग ठंड से सुन्न हो रहा था लेकिन अनिकेत के कदम तेज़ी पर थे "आह .....

माएँ

माएँ कल निकाली जाएंगी माएँ सीलन और बदबू से भरे अंधेरे कमरों से  उन पर जमी अकेलेपन और बेचारगी की धूल को  साफ किया जाएगा किसी मलमल के कपड़े से , छिपायेगी औलादें उनके चेहरे पर जमी अनुभव की झुर्रियाँ अपनी नासमझी की कमाई से और बेमतलब के रिश्तों की आड़ में , बिखेरा जाएगा उनका वजूद "तुम मेरी जिम्मेदारी हो माँ " बोलकर , फेसबुक की लाइक ,इंस्टा के फॉलोवर के भीड़ में उसे एक दिन और अकेला छोड़ देंगी उनकी निशानियां फिर बताने आएंगे आर्चीज़ के कार्ड ,पैराडाइस के केक ,तनिष्क के हीरे कि प्यार और अपनेपन का मोल कैसे चुकाते है, भर जाएगी माएँ उस एक और आत्मग्लानि के बोझ से  कि शायद वो अपने हाथों को जला कर भी रोटियों में वो स्वाद न दे पाई  कि शायद वो नही दे पाई रातों को जागकर भी अपनेपन की परिभाषा , हर तरफ happy mothers day के रंग में खुद को बेरंग मानकर माएँ फिर चुन लेती है 365 दिनों का अज्ञातवास , फिर खोलती है सीलन वाले संदूक के अकेलेपन को और गुम हो जाती है उस मातृ दिवस के इंतजार में जहां होंगी उसकी अपनी परछाइयाँ उसकी अपनी यादों संग उसके अपने अस्तित्व संग  नही पहुंचती किसी तक इन बन्द होते स...

स्त्री फ़िल्म समीक्षा

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#stree स्त्री.....स्त्री जो माँ, पत्नी,बेटी,बहु,बहन या एक वैश्या भी होती पर सबसे पहले वो स्त्री होती ।सम्मान ,प्रेम और एक स्थायित्व की भूखी होती है स्त्री। स्त्री फ़िल्म की बात करने से पहले हम "ओ स्त्री कल आना" या नाले बा की बात करते। लोककथा,एक मान्यता या सबसे सटीक एक अंधविश्वास है "ओ स्त्री कल आना"। कर्नाटक और उसके आस पास क्षेत्र में एक प्रथा है कि स्त्री के प्रकोप से बचने के लिए लोग अपने घरों के बाहर लिखते है "नाले बा" कन्नड़ शब्द जिसका अर्थ कल आना ।यहां स्त्री से अर्थ एक काले जादू से भरी स्त्री की आत्मा जो घर के पुरुषों को अपनी अतृप्त इच्छओं हेतु उठा ले जाती उससे बचने को "ओ स्त्री कल आना" लिखते है। अब फ़िल्म पर ........भारतीय सिनेमा में हॉरर फिल्में अपने तरह का हॉरर पैदा करती उस पर गर रामसे brother पर आये तो उनकी फिल्में भय नही जो कामुकता और फूहड़ता पैदा करती कि उससे ये लगता हॉरर फिल्में भारतीये सिनेमा के लिए अभिशाप है और वो भी कॉमेडी हॉरर तो ट्रैन में बंटे अखबार के हालात जैसी होती सिर्फ जूते पोछने के काम आती । ऐसे में एक अंधविश्वास से भरी लोकमान्...

श्रद्धांजलि एक कलाकार को (इरफान खान पुण्यतिथि विशेष )

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" अरे मेरी अँखियों पर मत जा तेरी माँ कहती थी कि आपकी आंखे बड़ी रसीली है" अंग्रेज़ी मीडियम का ये एक दृश्य इरफ़ान के हल्के फुल्के वाले कॉमेडी अंदाज़ में बोले हुए शब्द  लॉक डाउन में भी मैं मुस्कुरा पड़ी और माँ से बोली "अभी इरफ़ान पूरी तरह ठीक न हुए है वरना इस फ़िल्म के लिए मीडिया में जरूर आते और आज ठीक 15 दिन बाद ये सुनती की अब इरफ़ान हमारे बीच कभी नहीं आएंगे । इरफ़ान का TV से फिल्मों तक आने का सफर बहुत कठिन और लंबा था उसी तरह एक एक प्रशंसक के दिल में उनके लिए प्रेम भी उतना गहरा है । मैं इस तरह दुखी इससे पहले जगजीत सिंह जी मृत्यु पर हुई ।इरफान से भी वही रिश्ता था एक फनकार एक अदाकार और मैं और रिश्ता दर्द का । वैसे तो चंद्रकांता सीरियल के सोमनाथ बद्रीनाथ की दोहरी भूमिका में इरफ़ान को जाना पर पहली बार उनको सलाम बॉम्बे में मैंने नोटिस किया।भूमिका थी लेटर राइटर की और उस भूमिका के इरफान की वही बोलती आंखें .......सच अंग्रेज़ी मीडियम का यह डायलाग याद रहेगा "थारी आंखें बड़ी रसीली है" तब गूगल पर किसी अभिनेता को ढूंढा आज के जितना आसान न था इसलिए इरफान की बस आंखें याद और अभिनय फिर मैने इ...

सुपर डीलक्स

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रास कुट्टी रास कुट्टी !!!!   सुपर डीलक्स फ़िल्म का दृश्य है  शिल्पा जो कि एक पुरुष है पत्नी बेटे के होते हुए भी अपने अंदर के अर्धनारीश्वर को सन्तुष्ट नही कर पाता और एक रात परिवार को अकेला छोड़ गुमनाम हो लिंग परिवर्तन करा वापस आता ।शिल्पा को समाज ,उसका परिवार पत्नी नही अपना पाते पर उसका पुत्र रासकुट्टी उसे अपनाता है और एक दिव्य ज्ञान देता है। इस दृश्य में रासकुट्टी के खो जाने पर शिल्पा पुलिस स्टेशन जाती जहां का इंस्पेक्टर बर्लिन उसके साथ यौनाचार (ये दृश्य ये दिखाता की जिस समाज में लिंग परिवर्तन से स्त्री बने पुरुष के साथ यौनाचार हो सकता वहां स्त्रियों की क्या दशा होगी) के बाद उसे अपमानित करता है । चोट खाई शिल्पा बर्लिन के सर पर हाथ रख उसे मृत्यु का शाप देती है और चली जाती है ।बर्लिन हँसता है और बोलता हे ईश्वर इसके श्राप के बाद भी जिंदा हूँ  सुपर डीलक्स बुद्धिजीवियों के लिए देखने वाली स्क्रिप्ट है । इस दृश्य के बाद बर्लिन एक दिन अंतराल पर मरता है और ऐसी अचानक की मौत जो बर्लिन को पाप पुण्य सोचने का मौका नही देती । फ़िल्म की स्क्रिप्ट चार अलग चरित्र के जीवन की घटनाओं को साथ ले च...

सन्मार्ग

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ये एक लघु कथा लिखी थी कुम्भ में खींची अपनी ही फ़ोटो पर जोकि एक प्रतियोगिता में भेजी थी।अब तो फिलहाल उस ग्रुप से पंगा कर लिया तो परिणाम न जानना इसलिए यहां प्रस्तुत है। #सन्मार्ग संगम के किनारे पाप के धुलने के अलावा गर किसी चीज़ के लिए माने जाते है तो वो है फोटोग्राफी  के लिए । सूरज की किरणों संग उतरते गंगा में जैसे आग के शोले ,चंद्रमा की शीतलता में हिम से चमकते गंगा के किनारे ,अतिथि साइबेरियन पक्षियों का बुद्धिमान होता वो झुंड और आस्था की तमाम कहानियां निखरते ,निखरे और उभरते हम फोटो प्रेमी की जैसे जीवन रेखा होती है । शास्त्री पूल से संगम के फैले हुए तटों को मैं तकनीकी रूप से याद बना ही रही थी कि तभी कौतूहल से भरी एक वृद्ध आवाज़ आयी  "बिटिया इ डिब्बी उ वाला घाट दिखाई  जहां नहान होत है पुण्य वाला ?? ई डिब्बी पर थोड़ा मुस्कुरा कर मैं चौंकते हुई बोली कौन सा घाट बाबा यहाँ से तो बहुत कुछ दिखाता पर साफ नही क्योंकि ये डिब्बी कैमरा है बाबा दूरबीन नही जो पास करके दिखाए और पुण्य वाला स्नान हर घाट पर होता है आप चाहे अरैल से जाओ या झूंसी से ...आपका कल्पवास किधर है? बड़ी ही रहस्यमय मुस्कान ब...

irul film review

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#irul Irul मतलब डार्कनेस  फहाद की मैं बड़ी प्रशंशक हूँ ।फहाद और साई पल्लवी की athiran मैं इंग्लिश subtitle संग देखने को बेचैन हो पर अभी उपलब्ध नही इसलिए irul का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी कि फहाद और थिरलर कॉम्बिनेशन कुछ धमाल होगा लेकिन डेब्यूटेंट डायरेक्टर नसीफ यूसुफ का निर्देशन फहाद की अदाकारी को उभार कर नही ला सके। जब आप किसी मंझे हुए कलाकार के समान्तर कोई चरित्र गढ़ते अपनी स्क्रिप्ट में तो वो कलाकर भी उतना ही मंझा हुआ होना चाहिए और यहीं निर्देशक अपनी दूसरी गलती करता ।फहाद के सामने soubin साहिर को लेकर। फ़िल्म की कहानी  सिर्फ तीन कलाकरों के बीच घूमती जो कि है फहाद ,soubin और दर्शना । अलेक्स एक थ्रिलर नॉवेलिस्ट है जो कि अपनी पहली नावेल irul को मार्किट ला उसके रिव्यु का इंतेज़ार कर रहा है। अपनी प्रेमिका अर्चना संग वीकेंड बिताने के लिए जाते समय अलेक्स के हादसे के चलते एक घर में फंस जाता जहां उसकी मुलाकात एक अनजान इंसान unni (फहाद ) से होती है । उन्नी से अपने नावेल irul का रिव्यु जानते हुए अलेक्स को अहसास होता हैकि उसके साथ उसकी नावेल जैसा ही कुछ घट रहा लेकिन उस घर में फंसे अर्चना ...

पगलैट फ़िल्म समीक्षा

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पगलैट कहानी मेरी कही एक बात से शुरू होती है और मेरी कहि बात पर खत्म होती है "जब औरत समझदार होती है तो समाज न समझ हो जाता है " पगलैट में भी इसी को कहा गया हैकि जब एक लड़की को अक्ल आती है तो सब उसे पगलैट कहना शुरू कर देते है। समाज में लोगो के घरों में झांको या न झांको जाने कितने ऐसे बेमेल जोड़े अपनी शादी की 50 वी सालगिरह मना रहे होते जिनके बीच आत्मिक प्रेम,पति पत्नी में समर्पण जैसी भावना होती नही है लेकिन सब ऊपर से ठीक लग रहा है  । गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिये है साथ चलने लगेंगे ,बच्चा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा ,नई नई शादी थोड़ा समय लगता एक दूसरे का होने में या पति ने पत्नी की देह छू ली बस वो गहरा प्यार करता भले ही मुँह पर कपड़ा रखवा या किसी पर स्त्री की देह को सोचते हुए शारीरिक सम्बन्ध बनाता है पर समाज के पलड़े में जो सामान्य तो वो असमान्य होते हुए भी जरूरी है। पगलैट एक ऐसी ही लड़की की कहानी है जिसकी शादी होती सिर्फ इसलिए कि उसने एम ए तक पढ़ लिया और  लड़का 70000 महीना कमाता है ।बदकिस्मती से शादी के 5 महीने बाद लड़के की अचानक मृत्यु ।अब मृत्यु के बाद के तेरह दिनों के क्रिया कर्म में एक...

रूही फ़िल्म समीक्षा

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बॉलीवुड स्क्रिप्ट के मामले में कब क्रिएटिव होगा ? मैंने कोई फ़िल्म नही बनाई है पर खाना बनाया है जल्दबाज़ी में भी ,कम सामान संग भी और कम समय में भी ....क्योंकि में वो अपने घर वालों के लिए बनाती इसलिए किसी भी तरह से बनाऊ स्वाद और स्वास्थ्य के लिए अच्छा बना पहली कोशिश यही होती ।अब आप बोलोगे फ़िल्म समीक्षा और मेरी पाक कला का क्या सम्बन्ध ? बताती .... जिस तरह घर के लिए अच्छा खाना बनाकर परोसना मेरा व्यवसाय नही कर्तव्य है इसीलिए उसमें स्वाद होता ही होता सभी मसालों की संतुलित मात्रा के साथ उसी तरह से जब एक निर्देशक एक स्क्रिप्ट राइटर व्यवसाय से इतर सोच फ़िल्म बनाएगा लिखेगा तभी हर बार कहानी नई और पकड़ वाली होगी ।जब दिमाग में व्यवसाय का समीकरण चलेगा तब तो फार्मूला पुराना रख कर ही आंकड़े बदले जाएंगे ताकि लाभ निकल आये फिर चाहे मनोरंजन जाए भाड़ में। रूही फ़िल्म की स्क्रिप्ट शायद स्त्री फ़िल्म की सफलता का खुमार उतरने से पहले दिमाग में आ गयी तभी स्त्री वाले कटोरे में बासी दाल को तड़का लगाकर दर्शको के सामने परोसने की कोशिश की गई है।आप खुद सोचिए जिसकी स्क्रिप्ट का नाम बचकाना था रूहीअफजाना (शायद पहले...

परी फ़िल्म समीक्षा

 #परी मैंने जब परी का प्रोमो देखा तो एक परमब्रत चटर्जी और अनुष्का का किसिंग सीन देख ये लगा कि क्या ये हॉरर फिल्म में ये सब पर सब का भी अर्थ था। परी के लिए मैं काफी प्रतीक्षा रत थी और अच्छी प्रिंट के संग मिली तो देखा ।ये फ़िल्म साधारण हॉरर नही है काफी समझने वाली फिल्म है पर बहुत बेहतर स्क्रिप्ट हां ये तंत्र मंत्र की दुनिया का घृणित सच उल्टी कर दे ऐसा दिखाया है ।prosit roy ने बहुत अच्छा निर्देशन किया। कहानी है बांग्लादेश के एक गांव से नाबालिग लड़कियों के गायब होने से शुरू होती और इसके बाद शुरू होता शिशु कंकाल विशेष कर खोपड़ी मिलने का सिलसिला शुरू होना । कहानी को समझने के लिए मैं  पहले एक विशिष्ट धर्म में आत्मा दुरात्मा की कहानी को बता दूं।हमारे धर्म में नर पिशाच होते हैं वैसे ही एक धर्म से इफ़रित शैतान का जिक्र किया है इस फ़िल्म में । इरफित  किसी को दिखाई देता है न बस उसकी साँसों की आवाज़ सुनायी पड़ती है वो नाबालिग लड़कियों  से बिना शरीर सबन्ध स्थापित कर शैतान की और औलादों को जन्म देता है ।इफ़रित कि औलाद के जन्म देने की प्रक्रिया अल्हाद चक्र कहलाती हैं ,जिन लड़कियों से वो संबंध ...