chup :revenge of the artist

chup:revenge of the artist

जबरदस्त जबरदस्त जबरदस्त

"किसने तुझे अधिकार दिया की तू किसी फिल्म को ख़राब और अच्छी बता सके    फिल्म रिव्यु का मतलब होता है फिल्म को महसूस कारना "

चुप फ़िल्म :
एक दिन कार ड्राइव करते हुए FM  पर एक गीत को काफी प्रोमिसिंग बताते हुए RJ ने अगला chart buster  बताया। गीत था चुप फिल्म का गया गया दिल ये गया। गीत अच्छा लगा घर आकर मूवी सर्च की और डिटेल्स निकाली और २५ बार गीत गया गया को सुन डाली। जब फिल्म का ट्रेलर देखा तो समझ गयी एक तरह की रोमांटिक मर्डर मिस्ट्री है लेकिन जब गीत को सुना बार बार सुन तो समझ गयी कि बल्कि ने कुछ नहीं बहुत खास फिल्म बनाइ है क्यूंकि गीत में ही फिल्म कि कहानी है बस वही ढूंढ पायेगा जो दिमाग से लेखक हो और दिल से फिल्म कि स्क्रिप्ट को महसूस करता हो कुछ मेरी तरह या यूँ कहूं कि फिल्म शायद मेरे जैसे फिल्म रिव्यु देने वालों और सिने लवर के दर्द को ले लिखी गयी मतलब कि बस एक शब्द ब्रिलियंट बोले तो ब्रिलियंट।


फिल्म चुप कि बात करने से पहले फिल्म के निर्माता निर्देशक कि बात करते है तो निर्माता निर्देशक आर बालकृष्ण यानि आर बल्कि। आर बल्कि कोई अनजाना  नाम नहीं है आर बल्कि ने अपना सफर चीनी कम से शुरू किया था फिर शमिताभ ,कि एंड का ,पा ,padman ,इंग्लिश विंग्लिश और मिशन मंगल जैसे mile  स्टोन को अपने सफर में जोड़ते गए। जुलाई २०२१ में आर बल्कि ने स्वर्गीय गुरु दत्त जी श्रधंजलि देते हुए एक फिल्म कि घोषणा कि जो फ़िल्मकार के नकारत्मक आलोचनाओं से डूबने को दर्द को दिखाएगी और वहीँ से चुप जैसी मास्टर पीस कि कहानी शुरू हुयी।

अब आते है फिल्म कि कहानी पर
फिल्म कि कहानी शुरू होती अपने  ही घर में मिली एक फिल्म क्रिटिक कि  लाश से जिसकी कि हत्या बहुत ही दरिंदगी के साथ हुयी थी और एक ही शरीर पर जख्मो संग जैसे हतयारे ने बहुत से सन्देश छोड़े हो समाज के लिए। क्राइम ब्रांच हेड अरविन्द माथुर (सनी देओल ) इस मर्डर को सोल्वे करते इससे पहले हफ़्तों के अंतराल में ४ ऐसे और मर्डर होते है जो पूरे फिल्म क्रिटिक के लिए के लिए एक सन्देश होता है कि फिल्म आलोचना के लिए नहीं बनती फिल्म को कला कि तरह महसूस करने के लिए बनती है। इन सीरियल किलिंग के बीच मुंबई में फिल्म क्रिटिक बनने का सपना ले  कर आयी नीला मेनोन (श्रेया धन्वंतरि ) जोकि पेशे से एक एंटरटेनमेंट रिपोर्टर है और फिल्म लवर भी एक अनजान फ्लोरिस्ट डैनी(दुलकर सलमान) से  प्रेम कर बैठती है। नीला के फिल्म क्रिटिक बनने के सपने को मनोचिकित्स्क जोबिना (पूजा भट्ट )और अफसर अरविन्द सीरियल किलर को पकड़ने के जाल कि तरह उपयोग में लाते है और यहीं से उन्हें  मिलती है एक नाकामयाब निर्देशक कि  सीरियल किलर बनने कि भावुक  कहानी।


अभीदो दिन पहले ही इस फिल्म को गुरुदत्त जी से जोड़ने पर मैंने लिखा था कि उम्मीद है निर्देशक गुरु दत्त जी के साथ न्याय करेंगे और सच में आर बल्कि ने गुरु दत्त कि आत्मा को आज श्रद्धंजलि दी। फिल्म न सिर्फ गुरु दत्त के बर्बादी और अवसाद के उन दिनों के दर्द को दिखाती बल्कि ये बताती भी कि कैसे अपना सब कुछ दांव पर लगा चूका एक उम्दा  निर्देशक फिल्म समीक्षों के चंद नकारात्मक शब्दों कि वजह से एक गहरे अन्धकार में चला जाता  जोकि कभी कभी मौत कि राह भी होती है (उम्मीद है इस समीक्षा को पढ़ने वाले युवा वर्ग गुरुदत्त कि मृत्यु कि वजह को जरूर पढ़ेंगे ) कुछ हद तक ये फिल्म स्वर्गीय  सुशांत सिंह के दर्द को भी दिखाती। कभी कभी इस चकाचौंध कि दुनिया कि चमक आपको एक पल में इतना अकेला कर देती कि आप या तो खुद को बर्बाद करते या किसी और को।  पूजा भट्ट एक संवाद बोलती भी है कि चलो गुरु दत्त ने तो सिर्फ खुद को बर्बाद किया पर किसी और को गुरुदत्त तो न बनाया। यही नहीं आर बल्कि ने स्क्रिप्ट इतनी खूबसूरती से लिखी कि गुरुदत्त के गाने उनकी फिल्मो के दृश्यों को नीला और डैनी के प्रेम दृश्यों से ऐसा जोड़ा कि एक पल को लगता है तो गुरुदत्त के प्रशंशक उनकी फिल्मो के दृश्यों को फिर से जी रहे होंऔर फिल्म का अंत और गुरुदत्त जी का गीत "ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है " उफ्फ्फ थ्रिलर  रोमांस से अचानक एक इमोशनल ड्रामा में आ जाते है जो काफी संवेदनशील बन पड़ा है। इससे ज्यादा का लिखना एक सस्पेंस ड्रामा के लिए उचित न होगा।

अब बात कलाकारों कि तो पहले आते है दुल्क्वर सलमान ,क्या चीज़ हो आप यार ?? अभी आपको सीता रामम में देखा अभी आपको चुप में। कहाँ से लाते है इतना वेरिएशन कहाँ से ? दुल्क्वेर  के लिए ये फिल्म हिंदी सिनेमा में रेड कारपेट बिछाती है बॉलीवुड में उनका स्वागत करने के लिए। आप सिर्फ और सिर्फ दुल्क्वर और आर बल्कि के लिए देखें फिर मेरी बात को जज करें। श्रेया अंडर रेटेड एक्ट्रेस है ही। उनकी अदाकारी कि खूबसूरती दर्शक scam  १९९२ और the family man देख चुके है slow but steady श्रेया ने अपने बलबूते पर दर्शकों के एक कहस वर्ग में अपनी जगह बना ली है good going श्रेया। अब बारी आती है दो ऐसे कलाकारों कि जिनकी अदाकारी को दर्शक पहले देख चूका है जिसमे से एक है नकारी हुयी और एक है एक ही तरह के अंदाज़ के लिए यानि पूजा भट्ट और सनी देओल तो शायद पूजा भट्ट कि ये सबसे बेहतर फिल्म डैडी फिल्म के बाद। रोल छोटा पर सही और पूजा निभा भी गयी या बल्कि ने निचोड़ लिया जो भी हो अच्छा था। सनी देओल एक शांत पर तेज़ क्राइम ब्राँच अफसर के रूप में पहली बार आये है शयद। नो मारधाड़ नो चीखना चिल्लाना सिर्फ दिमाग कि तेज़ी से केस सोल्वे करना और हाज़िर जवाबी दिखाना। सनी प्रा जी आप कर गए और जचे भी। यहाँ एक नाम और है श्रेया कि अंधी पर बहुत तेज़ दिमाग माँ का जोकि है saranya ponvannan तमिल और तेलगु सिनेमा का जाना मन नाम पर बॉलीवुड में चुप के साथ एंट्री ली है। आप नीला और उसकी माँ कि केमिस्ट्री देख अच्छा फील करेंगे।

बात करते फिल्म के गीत संगीत कि अमित त्रिवेदी के संगीत में एक ही गीत है गया गया दिल ये गया जोकि अगर कहेंगे ऐसे लिखा गया जैसे कि फिल्म कि स्क्रिप्ट हो और ऐसे संगीत बढ़ किया गया जैसे कि फिल्म कि धड़कन हो        खूबसूरत बेहद  खूबसूरत बाकि गुरुदत्त जी कि फिल्मो के गीत जैसे जाने क्या तूने कही ,वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम और ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है को बड़े अलग अंदाज़ में बिना रीमिक्स और शोर शराबा जोड़े ऐसे रखा गया है कि आप चुप देखने के बाद कई दिनों तक इन गीतों को सुनते रहेंगे।

अब आती हूँ फिल्म कि स्क्रिप्ट और हम जैसे फिल्म प्रेमी के बीच के एक सह सम्बन्ध पर
एक जगह श्रेया यानी नीला बोलती कि फिल्म के बिना ये जीवन कैसा ,देखो देखो चाँद है अभी फिल्म होता तो इसका कोई संगीत होता कोई शब्द होता पर यहाँ ऐसे आसमान  है।अकेला सा  
सच है मैं भी सिने प्रेमी लेकिन ये प्रेम चका चौंध का नहीं ये प्रेम है फिल्म कि रूह को समझने का या फिल्म को दिल से देखने का और वही बात मेरी समीक्षा में होती यांनी कि निर्देशक ने कितना डूब कर फिल्म को बनाया उनको महसूस करने वाले कुछ गिने चुने सिने प्रेमी होती है और उनके लिए न सिर्फ फिल्म का अच्छा होना जरुरी बल्कि फिल्म कि समीक्षा का भी ईमानदार होना जरुरी। जब मैं बल्कि कि स्क्रिप्ट को देख रही थी तो लगा कहाँ से ये मेरे दिमाग में घुस कर ये स्क्रिप्ट लिखे कि सच में ५ स्टार या १ स्टार में फिल्म के निर्देशक कि मेहनत न समझ आती बल्कि फिल्म कि रूह को दर्शक तक पहुँचाने से फिल्म कि मेहनत समझ आती। कोई कुछ भी कहे पर आर बल्कि ने जिस स्टार तक जा कर ये कहानी लिखी बिना किसी लूप होल के मैं इस फिल्म को सालों साल याद रखूंगी और ये फिल्म अच्छे निर्देशकों कि पीडा को दिखा ते हुए पेड रिव्यु करने वालों के मुँह पर एक थप्पड़ है।

जरूर देखे अगर ये न देखि तो एक अच्छी फिल्म ऑस्कर कि रेंज से बाहर  हो जाएगी (और ये फिल्म मात्र १० करोड में बनी है )

बस तो नकारत्मक बातें
१ हत्या के तरीके और बाद में शव कि दुर्दशा बहुत ही ज्यादा अमानवीय दिखाया है कि उलटी आ जाती इसीलिए शायद ये १८ साल से ऊपर के लोगों के लिए है।
२ अंत को इमोशनल करते करते १% कि गुणवत्ता से आर बल्कि चूक गए वरना फिल्म १०/१० कि रेटिंग रखती।


(भाई फिल्म समीक्षकों कि   हत्या देख मैंने बल्कि जी कि इस फिल्म ईमानदारी से इतने स्टार दे दिए है कि वो अपने आने वाले प्रोजेक्ट में जोड़ सकते )

टिप्पणियाँ

BIRDEYE ने कहा…
बहुत खूब । और समीक्षा पढ़ कर तो फ़िल्म देखने की इक्छा और प्रबल हो गयी । ये फ़िल्म थिएटर में ही देखने लायक है ।
प्रमेश साध ने कहा…
बहुत खूब । बहुत अच्छी समीक्षा । और समीक्षा पढ़ने के बाद तो फ़िल्म देखने की इक्छा और प्रबल हो गयी । ये फ़िल्म थिएटर में ही देखने लायक है
JAYESH DAVE ने कहा…
.... ये रिव्यू आर बाल्की तक पहुंचना चाहिए,
एक दम ईमानदार , मास्टरपीस चित्रण, ठीक इस मूवी की तरह ही
ये मूवी पीढियो तक याद रखी जाएगी,

बहुत बढ़िया अम्मू ❤️
बेनामी ने कहा…
Nice
Unknown ने कहा…
बहुत सुन्दर
✌️✌️
फिल्म एक कहानी नहीं
दर्द के पीछे छुपा सत्य है

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