जगजीत सिंह जी

ये लेख मैंने जगजीत सिंह जी की मृत्यु के बाद लिखा था 
।इस लेख मेरी लिखने की क्षमता को।लोगों के सामने लाया ।जैसे जगजीत जी दुबारा नही जन्म ले सकते वैसे ही मैं ऐसा कुछ दुबारा नही लिख सकती।

नमन

#जगजीत_सिंह_जन्मदिन_विशेष

"चिट्ठी न कोई सन्देश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए "   
दर्द की गहराइयों से उभरती आवाज़ जो आज हमेशा के लिए चुप हो गयी .......चुप हो गयी एक दर्द भरी दास्तान भी ..................शायद  ही कोई जानता होगा कि कि अपनी आवाज़ और दूसरों के दर्द से रिश्ता कायम करने वाले जगजीत सिंह का खुद दर्द से रिश्ता कितना गहरा था I जगजीत सिंह  लोगों के लिए एक मखमली आवाज़ के मालिक, एक गायक कि तरह ही थे जिनकी आवाज़ में लोग खुद के दर्द को ढूंढते थे ,पर जगजीत जी इससे परे भी एक शख्शियत थे जिसने अपने दर्द को ही नही औरों के दुःख को भी समेटा था I
                            श्री गंगानगर ,राजस्थान में जन्मे जगजीत सिंह का हमसे आपसे सम्बन्ध तभी बन गया जब जगजीत सिंह मुंबई अपने भाग्य को आजमाने आये ,ये दौर था १९६५ का I  मायानगरी में नाम से शक्शियत बनाने के इस दौर में ही जगजीत सिंह अपनी जिंदगी से मिले ,उनकी जिंदगी ...चित्राजी से I भले ही उस समय काल में मैं नही जन्मी थी पर यहीं से मैं जगजीत जी से जुड़ गयी I चित्र जी इस समय खुद के आतीत से लड़ रही थी ,ऐसे में जगजीत जी का आना उनके जीवन के लिए एक नया सवेरा हुआ I शायद अपने इस गीत "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या गम हो जिसको छुपा रहे हो  " कि गहराइयों से ही जगजीत सिंह जी ने चित्रा जी के दर्द को समझने कि कोशिश ही नही ,उनके दर्द को समेटने कि इज़ाज़त भी मांगी होगी ..... चित्रा जी के दर्द को खुद में समेट कर उनकी आवाज़ का  रूमानी अहसास और गहरा गया I साथ -साथ मूवी का यह  गीत "ये तेरा घर ये मेरा घर ,किसको देखना हो गर ,तो पहले आके मांग ले तेरी नज़र मेरी नज़र " जैसे   शायद चित्रा जी और जगजीत जी कि प्रेम कहानी का शाब्दिक वर्णन हो गया I इस गीत को सुनना मेरे लिए दीप्ति नवल या फारुख शेख अदायगी के साथ नही होता था इस गीत के साथ मैंने हमेशा जगजीत जी और चित्रा जी को महसूस किया है I सिमटते दुःख और गहराते संबंधों के साथ हर पल जगजीत सिंह जी आपने प्रशंषकों से जुड़ते गए I  जुड़ते गए मेरे जैसे कुछ लोग I 
                                    जीवन के उतार चढाव से लगते उनके गीत के साथ जगजीत सिंह के जीवन कि एक  घटना ने मुझे दिल कि गहराइयों से उनके साथ जोड़ दिया ,ये घटना थी  जुलाई ,१९९० में उनके पुत्र की आकास्मक मृत्यु I उनके प्रशंषकों के लिए दुखद समाचार पर शायद ही कोई उनके इस दुःख को गहराइयों को महसूस किया होगा I  पुत्र की मृत्यु के बाद बिखर गयी चित्रा जी को फिर से समेटा होगा जगजीत सिंह जी न पर कैसे समेटा होगा खुद जगजीत सिंह जी ने ?  इस घटना के बाद चित्रा जी का फिर से गायकी से जुड़ना संभव न हुआ पर जगजीत जी ने खुद को इस के लिए तैयार किया क्यूंकि उन्हें अपने प्रशंषकों के लिए जीना था ,गाना था I  मैंने खुद को उनकी जगह रख कर महसूस किया , दर्द महसूस हुआ पर वो जज्बा नही ला सकी जो जगजीत सिंह जी ने खुद हर दर्द से निकलने में दिखाया I हम अपने दर्द को जाने अंजाने दिखा ही देते हैं पर जगजीत सिंह जी ने छुपा लिया हर दर्द को ,हर तरह से I १९९८ में पर्दर्शित दुश्मन मूवी के गीत " चिट्ठी न कोई सन्देश ,जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए " में मुझे उनका दर्द दिखा और लगा कि इस गीत कि रेकॉर्डिंग के समय जगजीत जी ने विवेक ( जगजीत जी दिवंगत पुत्र का नाम ) को सामने देखा होगा और अपने हर दर्द को इस गीत पिरो दिया होगा I  तभी आज भी इस गीत को सुन कर मेरी आँखों से आंसूं निकल आते हैं I
                                   समय के चलते जगजीत के घाव भर तो गए होंगे पर टीस तो हर पल रही होगी I  हर दर्द को छुपा कर जब वे कोई प्रेम गीत गाते तो बस दिखती चित्रा और उनके अटूट प्रेम कि झलक .........साल दर साल , पल हर पल प्रशंषकों से उनका लगाव गहराता गया ... मैं शायद उनके हर पल से नही जुडी हूँ पर मैं उनके हर दुःख से जरुर जुडी हूँ.....मैं उनके गीतों में खुद को ढूढ़ते कब उन्हें ढूँढा मुझे पता ही नही चला ......सुना था पर आज महसूस किया है कि  जो हमारे दिल के करीब होता है उसके होने का हर पल ना हो पर उसे खोने कि बाद उसके न होने का अहसास हर महसूस होता है I
                    जगजीत जी के जीवन के एक और दुःख ने  मुझे उनके जीवन का हिस्सा ही बना ,ये था २००९ में उनकी और चित्रा जी कि पुत्री ( चित्रा जी के पूर्व विवाह से )का आत्महत्या करना इफिर से अंत हिन् दुःख ,फिर से एक सदमा और फिर जगजीत जी चित्रा को संभाला ............इतना दुःख ............कैसे बर्दाश्त किया होगा आपने ? कैसे हर बार संभाला होगा खुद को ? और हम बस जान पाए एक महान गायक को ..........नही ये कम है उनके लिए ...बहुत कम है ........आपके दुःख को महसूस करते -करते ,खुद को महसूस कर रही हूँ ,महसूस कर रही हूँ कि हमने क्या खोया है ...मैंने क्या खोया है ये कहने का आधिकार नही है मुझे .....पर आपके हर गीत में आपको महसूस करने का अधिकार है मुझे .............सुना था कभी कि हर कलाकार अपनी किसी एक कृति में अपने आप को ढालता है .......आपके इस गीत में आपके जीवन का दर्द उबार आया ...."जग ने छीना मुझसे ,मुझे जो भी लगा प्यारा ,सब जीता  किये मुझे से ,में हर दम ही हारा ".......पर आप हारे नही थेअपने दर्द से .......आप हर बार जीते थे.......और आज भी मृत्यु के जीत के भ्रम को कयाम रहते हुए भी जीते हैं .......अपनी कभी न भूल पाने वाली आवाज़ का तोहफा हमे दे कर ...........अपने गीतों के साथ हमारे जीवन में ........हमारे अंत तक ...........
                      
                                                        

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

thereader

लुटेरा

कनखजूरा