maja maa

#मज़ा मा

"कैसे? कैसे किया माँ.. तुमने झूठ बोला और lie डिटेक्टर पर पकड़ी भी न गयी "

"मैंने कोई झूठ न बोला उनके सवाल ही गलत थे…. वो शयाद ये पूछते कि क्या आपने किसि औरत से प्रेम किया हैँ to मैं ख़ुशी ख़ुशी फेल हों जाती टेस्ट में पर उन्होंने पूछा कि क्या किसी औरत संग सेक्स किया तो वो नहीं किया…. प्रेम और शारीरिक आकर्षण का अंतर नहीं जानते न "


प्राइम पर स्ट्रीम माधुरी दीक्षित द्वारा अभिनित एक low बजट फैमिली ड्रामा टाइप मूवी…ज़ब review लिखूँगी तब शयाद लोग जानेंगे 😊😊


खैर फ़िल्म पर आते…. समलैंगिक संबंधों पर आधारित फ़िल्म फायर के बाद ये कौन से number कि लेस्बियन स्क्रिप्ट पर बनी फ़िल्म हैँ ये न पता पर पहली बार इस विषय पर कोई फ़िल्म मिली जो इस तरह के संबंध पर घिन नहीं तरस और प्प्रश्नों को छोड़ती कि क्या हैँ समलैंगिक होना, क्या होता हैँ ज़ब एक औरत अपनी सेक्सुलिटी के ले बोलती हैँ, कहाँ से ऐसी भावनायें आती, क्या ये पीढ़ी दर पीढ़ी जाने वाली बीमारी हैँ, क्यों एक स्त्री एक स्त्री को ही पसंद करने लगती हैँ??


अभी कुछ दिन पहले ही मैंने लिखा कि जब आप खुद को कहना या जीना शुरू करते वहीं से विद्रोही हों जाते हैँ और देखो इसी एक लाइन को पकड़ फ़िल्म बन गयी 😊😊😊

शर्मनाक कि पुरुष के दिमाग़ में उतपन्न एक यौन कुंठा को वो किसी ऐसी स्त्री या लड़की पर निकाल लेता, बलात्कारी बन जाता और सालों दर सालों इस अपराध कि साधरन सुनवाई होती रहती जहाँ कई बार वो अपराधी पुरुष सम्मनित जीवन भी पा लेता लेकिन अगर स्त्री में यौन कुंठा आ गयी तो बिना किसी को नुक्सान पहुंचाए भी अपने यौन सम्भध पार्टनर (पति, प्रेमी आदि ) से न कह सकती न ही इसे अपना sexual orientation को बदलकर निकाल सकती हैँ ऐसा किया तो समाज इतनी जल्दी खुद का कोर्ट रूम ट्रायल शुरू कर चरितहीन कि सजा भी सुना देता…आश्चर्यजनक


पहले फ़िल्म कि कहानी पर आती फिर इस मुद्दे को इसी फ़िल्म के आधार पर रखती


गुजरात के एक शहर कि मिडिल क्लास, अंतरमुखी, सुनदर सुशील और बहुत ही अच्छी कुक, डांसर और सबसे अच्छी माँ पल्लवी पटेल (माधुरी दीक्षित ) के जीवन में तब भूचाल आ जाता हैँ जब एक वीडियो के जरिये ये अफवाह फैल जाती कि मनोहर पटेल (गजराज राव ) कि पत्नी समलैंगिक हैँ….. पल्लवी से जुडी इस अफवाह के चलते उसके बेटे तेजस (ऋत्विक bhaumik) कि शादी एशा (बरखा ) से टूटनें के कगार पर आजाती हैँ….. तेजस कि सगाई को बचाने के लिए पल्ल्वी अपने समधी बॉब hansraj(रजित कपूर ) और पैम हंसराज (शीबा चड्ढा ) का आपत्तिजनक प्रस्ताव lie डिटेक्टर टेस्ट को भी स्वीकार कर लेती हैँ पर अंदर से टूट जाती हैँ..
पल्ल्वी कि बेटी tara(सृष्टि srivasta) जो कि मानवीय यौन इच्छाओं पर रिसर्च कररही और समलैंगिक समुदाय को बहुत सपोर्ट करती अपनी माँ को सच को कुबूलने को बोलती पर पल्लवी बेटे और परिवार के लिए chup रहना चुनती हैँ….. अंत में पल्लवी का समलैंगिक प्रेम ही उसे भावनात्मक रूपसे मजबूत करता जिसके चलते थोड़ा हास्यास्पद और नाटकीय तरीक़े से सब समझते हैँ और पल्लवी को सम्मान देते हैँ।

और जैसा कि नाम से समझ में आता….. मज़ा मा मतलब सब अच्छा हैँ…. फ़िल्म के अंत में यही होता….. यानि सब मज़ा मा।


ये फ़िल्म समलैंगिक होने को सही या गलत नहीं ठहरा ती हैँ बल्कि ये फ़िल्म बताती कि आप अगर जरा सा भी समाज परिवार के लिए जो नियम, मान्यता आदि बनाये गए हैँ उनसे हट के सोचते हैँ या गलती से भी जाहिर करते हैँ तो आपको बिना सुने सूली पर टांग दिया जाता हैँ…. और ये एक बहुत सही बात हैँ कि किसी बात कि सचाई और उस सच्चाई को किस तरह से दिखाया जाता हैँ इस पर ही उस बात का अस्तित्व ठीक जाताहै….. अब अगर आप फायर फ़िल्म का नंदिता दास और शबाना आजामी का चुम्बन दृश्य याद क़र मज़ा मा फ़िल्म को. चित्रित करेंगे तो अवश्यही आप खोदा पहाड़ निकला चूहा पाएंगे क्यूंकि वहां समलैंगिक ता में सिर्फ यौन कुंठा का छौका लगा था जबकि यहाँ दो विपरीत स्वाभाव कि लड़कियां…एक अंतरमुखी एक बाह्य मुखी और इसी विपरीत व्यक्तित्व के चलते सुरक्षा और समझ आकर्षण बन जाती जोकि कोई भी रिश्ते के रूप में न उभरती


सच कहूं तो 90 के दशक में अपने स्कूल के हॉस्टल कि लड़कियों में एक दूसरे के प्रति इससे ज्यादा आकर्षण देखा और सूना भी और अपनी सीनियर स्टूडेंट को इसके चलते आत्महत्या करते भी सुना था।


फ़िल्म के दृश्य में माधुरी अपने बेटे से कहती भी हैँ कि माँ को भगवान के जैसा सोचते सोचते तुम लोगों नें मेरे अंदर के इंसान को ही मुझसे छीन लिया।

सिर्फ बच्चे ही नहीं माँ बाप भी गलत हों सकते हैँ आखिर हैँ वो इंसान ही और इससे ऊपर ऐसा कौन सा इंसान हैँ जिसने अपने जीवन में गलती न कि पर क्यों सब उस गलती को ईतना बड़ा मान सजा और सुधार तय करने लगते हैँ??


एक अध्यात्म गुरु नें कुछ साल पहले बयान दिया था कि समलैंगिक होना कोई बीमारी नहीं प्रवृति हैँ जिस पर सोनम कपूर काफी उछली थी कि कैसे ये कहा ? भाई कुदेगी ही क्यूंकि बॉलीवुड और सेक्स का चोली दामन का साथ हैँ। ये चाहे तो समोसे में भी सेक्स घुसेड़ कर बेचे और उतना ही इसे टैबू बनाते जायेंगे 👏👏

अब बात फ़िल्म के कलाकरों कि

माधुरी नें परिवार के लिए जीने वाली गुणी स्त्री का किरदार बखूबी निभाया हैँ पर लेखक और निर्देशक और खुद माधुरी ये कब कुबूलेंगी कि वो अब धक धक गर्ल नहीं हैँ…. मेरा मतलब माधुरी और ग्लैमर को क्यों पूरक बना कर किरदार को लिखते?

गजराज राव के भूमिका जैसे रिपीट होने लगी हैँ वही बधाई हों बधाई वाला पति अधेड़ पर इस उम्र और सेक्स के नाम पर ताने खाने वाला पर ये पति लकी हैँ क्यूंकि अबकी बार पत्नी माधुरी हैँ 😍


रजित कपूर, शीबा चड्ढा, नीनाद कामत और सिमोन सिंह नें अपनी अपनी भूमिका को अच्छे से उभारा हैँ ऋत्विक अच्छे लगे…बरखा का NRI वाला एक्सेन्ट बहुत ही irritating था।

गीत संगीत खास न….. अब चुंकि डांसिंग दिवा माधुरी हैँ तो गुजराती कल्चर को जोड़ते हुए नवरात्री पर गरबा सांग डाल दिया जोकि हैँ साधारण पर त्यौहार के मौसम में 9वी दसवीं पादान पर बज रहा हैँ यानी so so


निर्देशक आनद तिवारी खुद एक अभिनेता हैँ अगर मैं गलत नहीं हूँ तो खाद्य तेल का एक विज्ञापन जिसमे फ्रिजर से आइसक्रीम का खाली डब्बा देख पति भड़कता हैँ वो पति आनंद ही हैँ। आनंद नें सधा हुआ निर्देशन किया हैँ यानी फ़िल्म बिना ये वो सीधे सपाट चलते हुए भी बांधे रखती हैँ.।


विषय पर न जाएँ और एक दो व्यंग्य को छोड़ दे तो फ़िल्म परिवार संग देख सकते ये अलग बात कि विषय और गंभीरता को समझने कि जगह आप बाद में ये कहें कि वाह माधुरी आज भी क़त्ल क़र देती तो…..


मेरे हिसाब से आप दर्शक हैँ बुद्धिजीवी नहीं

IMdb rating 6.1


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