अर्जुन रेड्डी vs कबीर सिंह
Arjun reddy vs kabir singh
सबसे पहली बात "हद से ज्यादा सही होना गलत होने वाला attitude कैसे दे सकता है ?
अर्जुन रेड्डी या कबीर सिंह यही बताते की हद से ज्यादा सही लोग ही पापा नाटेकर मेरा मतलब है कि नाना पाटेकर होते हैं
गज़ब यार
मैं इन दोनों ही फ़िल्म की बात नही करना चाहती थी पर करना जरूरी लगा क्योंकि दोनों के देखने के बाद ये महसूस किया कि रियल लाइफ स्टोरी के नाम पर किसी की सुहाग रात को लाइव कर देना कोई मनोरंजन नही है ।
दोनो ही फ़िल्म के द्वारा संदीप वेंगा जो भी कहना चाहते है वो फ़िल्म #संजू के घपा घप से कम अश्लील नही है ।
संजू में भी नशा ,लड़कियां और नासमझी ।इनदोनो में भी यही तो अंतर का स्तर क्या रखें।
हगा हुआ ही खाद बनाता है पर दोनो खाद्य नही होता ,संजू और अर्जुन रेड्डी में यही अंतर है और कबीर सिंह तो जो नाले में बह जाता है न वो वेस्ट मैटेरियल है ।
दोनो स्क्रिप्ट ही जुड़वा है बस 5 मिनट बाद वाला जुड़वा नयन नक्श से खराब है ।
दोनो में ही लीड मेल करैक्टर मेडिकल स्टूडेंट फिर सर्जन है पर जिंदगी बचाने के एक भी तरीके को बताने की जगह जिंदगी का बल्ब कैसे शॉट सर्किट कर बुझाया जाए ये बिल्कुल परफेक्टली बताया है ।
कौन से पैन किलर की कितनी डोज कितने पैन किलर इंजेक्शन के साथ कितना अल्कोहल लें कि आपके स्नायु तंत्र की बैंड बज जाए ताकि आप निस्तेज पड़े रहे और इस अवस्था में आपकी मूत निकल जाए ,अंतः वस्त्र भीग जाए और फिर आप कल ही जाग कर प्रेमिका के लिए सड़क पर भागे ।
वैसा वेंगा जी को डायपर से बड़ा प्रेम है एक बार हीरो को पहनाया और एक हीरो से इसका वर्णन करवाया शुक्र है नायिका के अंतःवस्त्र और सेनिटरी पैड्स को हाईलाइट नही किया ( फ़िल्म नारी प्रधान नही न इसलिए)
वेंगा जी ने एक और बात बताई की पुरुष जननांगों की शेविंग ट्रीमर से करते हुए खून भी निकल सकता है (क्या औचित्य था इस वाहियात दृश्य का )
भाई स्क्रिप्ट में ये सब डाले बिना आज के पुरुष आदि मानव की दशा में ही रहेंगे इसलिए शुक्रिया संदीप वेंगा जी पृरुषों को ये महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए ।
हीरो एक गुस्सैल प्रवृति का युवा है जो कि अच्छा और सच्चा है इसलिए सबको अपनी मिडिल फिंगर पर रखता है ।ये सच्चाई हीरो की तब बत्ती बन पीछे घुस जाती जब प्रेमिका से विछोह शुरू होता तब साहेब हर दूसरी तीसरी लड़की में प्रेम नही सेक्स ढूंढते हुए घूमते है बाकी सब करेंगे बस लड़की गलती से बोल दे कि तुमसे प्यार करती तो उसे ऐसे छोड़ भागते की जैसे उसने एड्स हुआ का सर्टिफिकेट दिखा दिया हो फिर उतेजित अंग को गन्ने के रस वाले से बर्फ ले शांत करते रहते है ।सीधे सीधे नायक के द्वारा निर्देशक आओ गुप्त ज्ञानपढ़ें के लिए प्रेरित करता है ।
आते है फ़िल्म की स्टोरी पर
फ़िल्म सागर किनारे एक बेड सफेद चादर में दो नग्न शरीर लिपटे पड़े है से शुरू होती है जिसमे बैकग्राउंड में सच्चे प्रेम के मिलने बिछड़ने के सफर को बताया जा रहा होता है ।
नायक फाइनल ईयर का स्टूडेंट मेडिकल कॉलेज में वही नायिका फर्स्ट ईयर की ।पहली नज़र बोकवास प्रेम जो दोनो को बस ये समझाता जहां मिलो लिप लॉक किंस करो फिर कुछ और ।उन्मुक्त प्रेम ये करवाता की लड़की बॉयज होस्टल में रह रही लड़का गर्ल्स हॉस्टल में जा रहा ,कॉलेज डीन चूतिया है नायक सबका भगवान है सब उससे डरते ।उन्मुक्त प्रेम नायिका को बस सेक्स,किस और नायक दवरा एक्स्ट्रा क्लासेज देता है ।जबकि नायक नायिका की सादगी मरता है ये फ़िल्म कहती पर वही नायिका उन्मुक्त प्रेम में आते ही खुला साँड़ बन जाती क़ि एयरपोर्ट पर भी प्रेम की परख के लिए सबके सामने किंस की मांग करती है वाह जी वाह ।अच्छा इस दौरान नायिका माई बाप चौथे के जन्म के लिए प्रयासरत रहते शायद तभी उन्हें समय न मिलता कि लड़की का उन्मुक्त प्रेम देख पाए कभी कॉलेज आ कर ।
जब लड़की वापस घर आती डाक्टरनी बन तब लड़का भी घर आता और दोनो बेचारे आदत से मजबूर छत पर ही कांड कर देते ।बाप देखते पिटाई शिताई गाली गलौच थप्पड़ शाप्पड़ पुराना ट्विस्ट ईमेल,फ़ोन ,सहेलियों ,सहेलाओं की उपस्थिति के बाद संवाद न होने की वजह से दोनो अलग ।नायक सदमे में अलग सदमा है ये जहां नायक हर लड़की से सेक्स की उम्मीद लगा रहा और प्रति वर्ष शराब के धंधे को प्रोत्साहन दे रहा है पर एक बात पी कर भी सर्जरी अच्छी करता मस्त वाली ।एक ही शहर आस पास होने के बाद भी बाकी डेढ़ घंटा दर्शकों को घुमाने के बाद संदीप वेंगा एक पार्क में 8 माह की गर्भवती नायिका से नायक को मिलाते है सब सही हो जाता है ।लड़का झटके में सुधर जाता क्लीन शेव (चेहरे की मैं संदीप वेंगा नही समझे जो बेवजह बकवास ढुंसु )।लड़की बाप भी होश जागता माफी मांगता नायक से और लड़के का बाप फैमिली फ़ोटो संग खुश और दर्शकों का क्या हुआ ?
अरे भाई एक शो की 70 सीट में दुइ ठो तो अर्जुन रेड्डी निकले ही होंगे जिनको ये नायक जबर वाला आदर्श लगा होगा ।
निर्देशक के लिए एक ही बात ,उनके अनुसार फ़िल्म के नायक के लिए शोले वाला डायलॉग "मौसी जी सौ बुरी आदतों के बाद भी लड़का हीरा है हीरा "
Arjun reddy vs kabir singh इसलिए कि विजय की तुलना में शाहिद ने फ़िल्म के महान नायक को करेला ऊपर से नीम चढ़ा के रूप में प्रस्तुत किया है ।
पूरी फिल्म में कुछ खूबसूरत है तो वो ये कामिनी कौशल को इतने दिनों बाद देखना बहुत मॉर्डन दादी के रूप में ।
बाकी फ़िल्म से ज्यादा छीछालेदर यहाँ न है फिर भी एक सवाल है क्या ये मनोरंजन है या मनोरंजन के नाम पर सस्ता जहर है जो हमारे ही पैसे पर हमारी ही पीढ़ी को एक गलत आदर्श परोस रहा है ?
टिप्पणियाँ