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अक्टूबर 3, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्वप्न..

सपनों के पंख नहीं होते ,गर होते तो मेरे आखों में ना सजते सजते पर अधूरे ना होते ,पंख के साथ उनकी मंजिल तक पहुँचते सपनों के पंख कट गए मेरी मर्यादों के धार से .... मर्यादों की धार जो काट ना सकी समाज की तलवार को