हर अमृता अमृता नहीं होती
हर अमृता की किस्मत में इमरोज़ नही होते
इसलिए हर अमृता अमृता नही होती
सुनो ------
सोच लो एक बार फिर
इमरोज़ की अमृता का साहिर भी होगा
दायें हाथ की ऊँगली से तुम्हारी पीठ पर
मैं बार बार साहिर का नाम लिखूंगी
तुम्हारे हाथ से चाय के प्याले थामते हुए
अनायास ही कह बैठूंगी " साहिर .....
तुम भी न .......
मेरी उँगलियों में तुम्हारी उंगलियों के पाश की जगह
अध् बुझी सिगरेट होगी जिसके धुएं से साहिर लिखूंगी
कोई दुरी न होगी कमरे के दो कोनो में
पर मैं कोई दुरी न तय कर सकुंगी दिलो के कोने में ,
फिर से कहती हूँ कि सोच लो
हर अमृता का इमरोज़ नही होता इसी लिए हर अमृता ,अमृता नही होती
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