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दोष हीन

आज गणेश चौथ है ...... फिर ललही छठ होगा .....फिर हरितालिक तीज ..... कहीं पुत्र के लिए ...कहीं पति के लिए .. मेरे जीवन की उपस्थिति के लिए कोई व्रत नही .... क्या मेरे उपस्थिति आज भी माँ ओं को कुंती बनाती है ?? मैं भी तो उसी हाड मांस का जनमा ,आस्थि पिंजर हूँ , फिर क्यूँ इतना भेद ??? मेरे हाथों के से लगी बाबूजी के आँखों में ऐनक ने भी मुझे अस्तित्व हीन ही समझा , मेरे हाथों से ओढाई हुयी शाल ने भी माँ को मेरे होने के अहसास से नही ढका.... मेरे आँखों ने देखे हुए सपनो ने भी मेरे अनुजों को मेरे होने का गर्व नही कराया , आज भी मेरे जनम को किसी पालीथीन में घुठने को मजबूर करते हो .. ... तुम्हारे अंश से ही बनती हूँ जन्मदाता .....फिर क्यूँ करके मुझ से इतना द्वेष ?