इतेफ़ाक
#इतेफाक
मैं इस फिल्म को फिल्म के ट्विस्ट से शुरू करुँगी ...फिल्म का ट्विस्ट एक वाक्य में " एक क्रिस्चियन औरत की बॉडी दफनाई नही गयी जलाई क्यूँ गयी ?...इत्तेफाक रीमेक कहूँ ..दूसरा भाग कहूँ क्या कहूँ ...खैर इस इत्तेफाक को १९६९ वाली इत्तेफाक से मत जोड़िये ..ये बिलकुल वैसे है ही जैसे "ओह माय गॉड " का एक विस्तृत वर्णन "PK" को कहना ......दोनों इत्तेफाक बिलकुल इत्तेफाक नही रखती एक दुसरे से .
फिल्म की कहानी शुरू होती है विक्रम सेठी (सिद्धार्थ मल्होत्रा ) के पुलिस कस्टडी से भागने से ....विक्रम एक प्रशिद्ध लेखक है और जिस पर अपनी ही बीवी के खून का इलज़ाम है ....विक्रम बरसात की एक रात पुलिस से बचते हुए एक्सीडेंट का शिकार हो एक अपार्टमेंट में छिपने जाते हैं जहाँ वो माया (सोनाक्षी सिन्हा ) के घर में घुस जाता है .....विक्रम ,माया के घर में कुछ अजीब सा देखता है ......विक्रम ,माया का एक दुसरे पर शक और आरोप चलता रहता है की तभी वहां विक्रम को ढूंढते हुए क्राइम ब्रांच के देव (अक्षय खन्ना) पहुँचते हैं ......देव को माया के घर में माया के पति शेखर की लाश मिलती है ....माया हत्या आरोपी विक्रम को बोलती है जब की विक्रम के अनुसार न उसने अपनी पत्नी और न ही माया के पति का खून किया है ..ये सब सोची समझी साजिश है ....तहकीकात में विक्रम पर एक आरोप और माया का एक अफेयर सामने आता है ...दोनों वजह काफी थी माया और विक्रम को अलग अलग दोषी मानने के लिए पर एक ठोस सबुत के आधार पर देव माया और उसके प्रेमी को शेखर के खून के जुर्म में गिरफ्तार करता है और विक्रम की पत्नी की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के आधार पर विक्रम बइज्ज़त बरी .....विक्रम इन सब से दूर लन्दन निकल जाता है तभी असली खुनी देव के सामने आता है पर तब तक देव खुद एक जाल में फँस चूका रहता है .....
गर आपके पास रस्सी लम्बी न हो और आप बार बार उस एक मीटर की रस्सी से कि मी के रस्ते नापेंगे तो अपने गणित में आप खुद ही उलझ जायेंगे ..यही फिल्म की कहानी थी ...शयद कुछ ऐसे स्क्रिप्ट लिखी गयी ...चलो इत्तेफाक जैसी इत्तेफाक बनाते हैं ...एक राजेश खन्ना वाला चरित्र ,एक नंदा का , एक इफ्तेखार जैसे पुलिस वाले ...कहानी सेट पर लिखेंगे ...बेवजह की दो हत्याओं को घटना बनाते हुए ,उन को एक दुसरे से जोड़ते हुए निर्देशक अभय चोपड़ा दर्शक से बहुत दूर चले गएँ है .....कलाकार थके हुए सोनाक्षी ,सिद्धार्थ और खुद अक्षय खन्ना एक हिट फिल्म की जरूरत है यार के सदमे में नज़र आये ....साइड करैक्टर इते नए की मंदिराबेदी (देव की पत्नी ) और शेखर (समीर शर्मा ) को छोड़ कोई नही समझ आता ..अच्छे बुरे अभिनय की बात तो बहुत दूर है ....किसी भी सस्पेंस ड्रामा में सब से अहम् होता घटना क्रम पर पकड़ और एक घुमाने वाला अंत पर यहाँ तो सब सामने था बस दो घंटे में पैरों से
हाथ निकल नाक पकड़ रहे थे तो कभी हाथो की चोटी बना .....गीत संगीत तो है ही नही ....लोकेशन और छायांकन के नाम पर टिप टिप बरसा पानी .....ज्यादा कुछ न कहते हुए ये फिल्म को अपने दम पर देखें और इसके बाद मुह
का स्वाद बदलने को पुराणी इत्तेफाक जरुर देखें ......."रात बाकी बात बाकी " मेरे को इस गाने का पैसा वापस चाहिए अंत में बजा ही न्हीच .....हुन्ह्ह
**/****(IMdb ने 7.8 रेटिंग कैसे दी भांग खा करके ??)
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