सन्मार्ग

ये एक लघु कथा लिखी थी कुम्भ में खींची अपनी ही फ़ोटो पर जोकि एक प्रतियोगिता में भेजी थी।अब तो फिलहाल उस ग्रुप से पंगा कर लिया तो परिणाम न जानना इसलिए यहां प्रस्तुत है।

#सन्मार्ग

संगम के किनारे पाप के धुलने के अलावा गर किसी चीज़ के लिए माने जाते है तो वो है फोटोग्राफी  के लिए । सूरज की किरणों संग उतरते गंगा में जैसे आग के शोले ,चंद्रमा की शीतलता में हिम से चमकते गंगा के किनारे ,अतिथि साइबेरियन पक्षियों का बुद्धिमान होता वो झुंड और आस्था की तमाम कहानियां निखरते ,निखरे और उभरते हम फोटो प्रेमी की जैसे जीवन रेखा होती है ।

शास्त्री पूल से संगम के फैले हुए तटों को मैं तकनीकी रूप से याद बना ही रही थी कि तभी कौतूहल से भरी एक वृद्ध आवाज़ आयी 
"बिटिया इ डिब्बी उ वाला घाट दिखाई  जहां नहान होत है पुण्य वाला ??

ई डिब्बी पर थोड़ा मुस्कुरा कर मैं चौंकते हुई बोली कौन सा घाट बाबा यहाँ से तो बहुत कुछ दिखाता पर साफ नही क्योंकि ये डिब्बी कैमरा है बाबा दूरबीन नही जो पास करके दिखाए और पुण्य वाला स्नान हर घाट पर होता है आप चाहे अरैल से जाओ या झूंसी से ...आपका कल्पवास किधर है?

बड़ी ही रहस्यमय मुस्कान बाबा ने दी और फिर बोले " धुल जात है न पाप गंगा में नहाये से? फ़ोटो लेया तू बिटिया हम चली घाट तक पैदल पैदल ......पूल न दिखाई ई डिब्बी।

बाबा बोले और हाथों से आर्शीवाद की मुद्रा बना झूंसी की ओर जाते हुए ओझल होने लगे ।

मैं फ़ोटो के लिए एंगल और दृश्य ढूंढते ढूढ़ते बाबा की रहस्यमयी मुस्कान और प्रश्न में ही अटक गई कि धुल जाते है न सारे पाप मात्र गंगा स्नान से ?

ये संगम पर पुण्य या मोक्ष या धर्म कर्म की बात नही ।बाबा की हर बात गूढ़ थी । बाबा का सवाल वो पुण्य घाट पूछना वो पूल का दिखाई न देने वाली बात ये प्रश्न दे गया कि क्या सच में मात्र एक पुण्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया संमझ स्नान या कुम्भ को मानना ही मोक्ष प्रप्ति का मार्ग है या इससे भी परे है कुछ? क्या पाप को धोने की इच्छा मात्र से गंगा की दो डुबकी पाप पुण्य का बही खाता सही कर देती है?

मैंने कैमरा ऑफ किया लेंस को कवर कर स्कूटी स्टार्ट की । राह पर तो चल पड़ी पर प्रश्नों के दोराहे पर साथ थी। सवालों को थॉड़ा सम्भालते हुए मैं अपने रास्ते पर केंद्रित हो गयी कि यूँ ही सवालों सँग गाड़ी चलाऊंगी तो राह न भटक जाऊँ फिर भी सवालों की नींद में ही थी कि तभी फ़ोन की रिंगटोन ने जगाया ।
"हेलो"
"हेलो हां किधर हो तुम ?
"संगम में हूँ बोलो क्या हुआ"
"डुबकी लगाने गयी हो क्या"
"नही मैं गंगा स्नान नही करती ,क्या हुआ बोलो"
"क्यों तूने पाप नही किया यानि तुम पहली इंसान हो जिसने पाप नही किया और पत्थर मार सकती ....हा हा"
"क्या बकवास है?....कुछ भी ???
"ओह तो तूने पाप किया ये सोचा भी न...हालंकि पाप धुलते नही है फिर भी मनन करना क्या कम है .....चल गंगा किनारे मनन कर आ फिर जरूरी काम रखता हूँ पहुंच कर फ़ोन करना बाय"
"बाय" फ़ोन कट पर दिमाग़ के तार जुड़ गए ।मैंने गाड़ी किनारे लगा पूल की रेलिंग से ही गंगा तट के विस्तार को देखने लगी और मन सुलझने लगा ।
बाबा ने बोला वो तट जहां पाप धुल जाए फिर मुझे पैदल ही चल घाट ढूंढना होगा .....दोस्त ने क्या कहा पाप धुलता नही ,मनन करो......गौतम बुद्ध ने बोधगया  में ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष का मार्ग पाया स्वयं से ....उसके बाद वो स्थल प्रशिद्ध हुआ ...वैसे ही हर व्यक्ति को अपने पापों का ज्ञान करना आवश्यक है बिना इसका मनन किये की हमने क्या किया एक डुबकी आपके पाप नही धूल सकती....बिना मनन के गंगा स्नान मोक्षदायिनी नही हो सकता ....सोचिए बुद्ध तो भटके होंगे ,राह ढूंढी होगी फिर ज्ञान प्राप्ति हुई तब बोध गया ,बोध गया कहलाया(बाबा ने मुझे ही पैदल वो तट ढूंढना होगा श्याद इसी का संकेत था) ....पर यहां तो गंगा का विस्तृत तट, यमुना सरस्वती का संगम ,पवित्र माह आपको आमंत्रित करते है कि आओ ,जीवन की व्यवसायिकता से कुछ क्षण ख़ुद आत्म केंद्रित कर जीवन मृत्यु ,मनुष्य योनि के महत्व को समझो ....बिना भटके ये विस्तार आध्यत्म के उन क्षणों में ले जाता यहां एक गृहस्थ भी साधु संतों से जीवन व्यतीत करता ...बिना स्वयं ही जागृत हुए .....मात्र गंगा तट के आकर्षण से ही कुछ पलों के ध्यान स्नान किया मैं आध्यत्म चिंतन  की दुनिया में  घूम आयी .…....दूर से आती "चलो मन गंगा यमुना के तीर "भजन की आवाज़ से मन की तंद्रा टूटी ...जगमगाती रोशनियों में तंबुओं का शहर देख मैं मुस्कुरा उठी ....अब संमझ पाई की स्नान का ये पर्व व्यवसायिक और राजनैतिक केंद्रीकरण से कितना अलग और कितना अद्भुत .....अलौकिक सन्मार्ग ......चलो मन गंगा यमुना के तीर 
(सबंधित चित्र इस अनुभव के शब्दों का प्रस्तुतीकरण है" गंगा के सन्मार्ग पर जाते साधु संत")
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