तलवार मूवी

#तलवार मूवी

"नूतन ...बाहर आओ ......लाश को पहचानना है ......पुलिस वाले उपर बुला रहे "
"पंडित जी ने कहा है अस्थि कलश को अकेला नही छोड़ना है जबतक अस्थि  विसर्जन न हो " 
"नूतन ......कलश गाड़ी में रख दो और बाहर आओ " 
"नही ....मैं श्रुति को एक पल के लिए भी अकेला नही छोडूंगी ..कभी नही " 

एक ऐसी डबल मर्डर मिस्ट्री जिसका हर सच सामने है ...हर पहलु देखा गया है फिर उससे जुड़ा फैसला क्यूँ नही स्पस्ट है ???क्या हुआ १५-१६ मई  २००८ की रात को नॉएडा के एक घर में की आज तक सब उस सच से अनजान है ?.ऐसे में एक सची घटना को स्क्रिप्ट में ढाल कर फिल्म बनाना अपने में ही जोखिम भरा काम  है ..... फिल्म कोई फैसला नही दे सकती सटीक की अपराधी कौन है ? फिल्म ये भी नही कह सकती की ये नही होना था फिर क्या होगा फिल्म में ? बिलकुल इसी सवाल के साथ मेरी तलवार फिल्म को देखने की उत्सुकता थी की आखिर क्या किस तरह से  आरुषि मर्डर मिस्ट्री को पेश किया होगा मेघना ने ? क्या अंत लिखा होगा विशाल ने ? .....सारे जवाब मिले इतनी खूबसूरती से मिले की मैंने आरुषि हेमराज मर्डर मिस्ट्री को बिलकुल अलग तरीके से देखा ...........कहानी शुरू होती है सी डी  ई इंस्पेक्टर  आश्विन कुमार (इरफ़ान खान ) से जो की डबल मर्डर मिस्ट्री केस की तहकीकात के लिए नियुक्त किये जाते है ....भूतपूर्व सी डी इ  हेड स्वामी (प्रकाश बेल्वाड़ी ) को आश्विन कुमार पर पूरा भरोसा है की वो इस अनसुलझे केस को सुलझाएगा ....तहकीकात शुरू होती है फिर से ...एक घर जहाँ एक रात चार लोग थे ,दो का खून होता दो जिन्दा है किसी ने कुछ  नही देखा सबूत भी पुख्ता नही ......टंडन दम्पति ( नीरज काबी और कोंकना सेन )अपनी १४ वर्षीय बेटी श्रुति (आयशा परवीन )और नौकर खेमराज की हत्या करने का आरोप झेल रहे हैं .......जब आश्विन तहकीकात शुरू करता है तो देखता है की किस तरह से सरकारी महकमे से जुड़े हर लोगों ने तहकीकात के 
साथ मजाक किया है फिर वो चाहे पुलिस इंस्पेक्टर धनीराम (गजराज राव ) हो या डॉक्टर का वो पैनल जिस ने पोस्टमार्टम से ले कर हर चीज़ को तोडा मरोड़ा बिना किसी दबाव बिना किसी के इशारे पे .....जोकि सबूत की नितांत कमी की तरह आते हैं ऐसे में शुरू होती है बन्दर बाँट आपने पद  को बचाने के लिए मीडिया और लबकी दबाव के चलते कुछ बेसिर पैर की बातों के आधार पर इस केस को ऑनर किल्लिंग का रूप दे दिया जाता है और पूछताछ के नाम पर धोखे  से रमेश टंडन (नीरज काबी )श्रुति के पिता को अरेस्ट कर लिया जाता है .......आश्विन बेकार वयवस्था और विभागों की लापरवाही के बाद भी पोलोग्रफिक टेस्ट नार्को टेस्टऔर अपनी तहकीकात  से ये पता कर लेता है की खून खेमराज के साथियों ने किया था जो की सबूतों के आधार पर भी सही उतरता है पर तभी सी डी ई के हेड स्वामी का सेवानिवृति का समय आ जाता है और वो आश्विन को इससे सचेत भी करता है की नए हेड दीक्षित (शिशिर शर्मा ) होंगे जो कि स्वामी और आश्विन दोनों से दुश्मनी रखते है और ये कहीं केस को प्रभावित न करें..........होता भी यही है दीक्षित के आने के बाद से महकमे के नाम पर सारी  सारी चीज़ें ऐसे पलटी जाती  है की आश्विन के हाथ से केस तो जाता ही जूनियर वेदांत (सोहम शाह )से मार पिट के आधार पर निलम्बन भी मिल जाता है .......फिर नई टीम ...फिर नई शुरुआत ...अबकी बार पॉल (अतुल कुमार ) की नियुक्ति होती है जिसे दीक्षित लाना चाहता था ...पॉल अपने कई साथियों को टीम में लेता है और एक फूहड़ता से भरी 
तहकीकात के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है जो फिर से आनर किलिंग वाले मुद्दे को लाती है ....लेकिन इस रिपोर्ट पर दोनों टीम की मीटिंग सीडीई तय करती है ताकि आश्विन और पॉल की रिपोर्ट की तुलना की जा सके .......आखिर में एक व्यंग के साथ सीडीई इसे अनसुलझा केस मान कर क्लोज़र रिपोर्ट तैयार करती है जिसमे अप्रत्क्ष रूप से माता पिता ही दोषी है ........वो इस रिपोर्ट के खिलाफ हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट जाते है जहाँ हार के बाद अनसुलझे रहस्य की सजा काटतेहै .................इस खुले केस में सब स्पष्ट है फिल्म किसी निर्णय पर नही जाती की कौन सच में खुनी है ???इसी प्रशन पर देखने लायक है विशाल और मेघना दवारा किया गया करारा व्यंग .......व्यंग, वयवस्था पर पुलिस की भूमिका पर ...क्यूँ नही सही समय पर फॉरेंसिक टीम आई , क्यू नही पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्लियर है , क्यूँ नही मिले कॉल डिटेल्स ली गयी , क्यूँ नही ब्लड सैम्पल लिए गए , क्यूँ नही क्राइम सीन को सील किया गया ....ऐसे बहुत से सवाल पर आश्विन ने करारा व्यंग किया है ............व्यंग के बाद फिल्म की जान है फिल्म के सधे  हुए कलाकार ....... इरफ़ान की अदाकारी पर कोई शक?  ये फिल्म सिर्फ इरफ़ान की है सिर्फ इरफ़ान की ..आश्विन की भूमिका में उनकी जगह कोई नही हो सकता था ..........नीरज काबी मैंने डिटेक्टिव व्योमकेश बक्षी में देखा था इस लिए पूरा विश्वास था की वो खरे उतरे होंगे और वो उतरे ...कोंकना भी बेहद उम्दा रही ..अपनी भूमिका में हर अदाकार  जँचा है और गज़ब एक्टिंग की है .....शायद ये असर था इसका कि सभी थिएटर आर्टिस्ट हैं .........गुलज़ार के गीत पर विशाल का संगीत भी प्रभावी रहा .....तब्बू का बेहद छोटा पर जानदार किरदार दो डायलाग में ही वो ऐसा हास्य उत्पन करती हैं की बस आप कहेंगे ओह तब्बू आप की बात ही अलग है .............इस फिल्म को पूरी तरह एक्सप्लेन  करता गीत है "पतली गली आ रे " जो की फिल्म में नही था पर सब से अच्छा वही है .........विशाल की स्क्रिप्ट एक दम सधी हुयी कहीं कोई झोल नही ..............मेघना से दूसरी बार मिली  हूँ बतौर निर्देशक "फिलहाल "के बाद और एक बार फिर कायल हो गयी हूँ मेघना की जिस तरह से उन्होंने एक सत्य घटना के हर कमजोर पहलु को उजागर किया है उस तरह अगर केस की तहकीकात की जाती तो शायद कातिल खुद खड़ा हो कर कोर्ट में चिल्ला रहा होता कि मैं हूँ खुनी हाँ मैंने खून किया है ........मैं इस फिल्म को बार बार देखना चाहूंगी और ऐसी फिल्मे बुद्धिजीवी वर्ग को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं ...आप भी देखें और सोचे की हम कहाँ खड़े हैं .......... बहुत खूब मेघना ...    *****/*****

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