सुपर डीलक्स

रास कुट्टी रास कुट्टी !!!!
 
सुपर डीलक्स फ़िल्म का दृश्य है 

शिल्पा जो कि एक पुरुष है पत्नी बेटे के होते हुए भी अपने अंदर के अर्धनारीश्वर को सन्तुष्ट नही कर पाता और एक रात परिवार को अकेला छोड़ गुमनाम हो लिंग परिवर्तन करा वापस आता ।शिल्पा को समाज ,उसका परिवार पत्नी नही अपना पाते पर उसका पुत्र रासकुट्टी उसे अपनाता है और एक दिव्य ज्ञान देता है।

इस दृश्य में रासकुट्टी के खो जाने पर शिल्पा पुलिस स्टेशन जाती जहां का इंस्पेक्टर बर्लिन उसके साथ यौनाचार (ये दृश्य ये दिखाता की जिस समाज में लिंग परिवर्तन से स्त्री बने पुरुष के साथ यौनाचार हो सकता वहां स्त्रियों की क्या दशा होगी) के बाद उसे अपमानित करता है । चोट खाई शिल्पा बर्लिन के सर पर हाथ रख उसे मृत्यु का शाप देती है और चली जाती है ।बर्लिन हँसता है और बोलता हे ईश्वर इसके श्राप के बाद भी जिंदा हूँ 

सुपर डीलक्स बुद्धिजीवियों के लिए देखने वाली स्क्रिप्ट है । इस दृश्य के बाद बर्लिन एक दिन अंतराल पर मरता है और ऐसी अचानक की मौत जो बर्लिन को पाप पुण्य सोचने का मौका नही देती ।

फ़िल्म की स्क्रिप्ट चार अलग चरित्र के जीवन की घटनाओं को साथ ले चलती । सभी चरित्र अपने जीवन में  परेशान है अलग अलग लेकिन अंत में सभी के द्वारा किया गया एक पुण्य कार्य किसी एक जिंदगी अनजाने में बचाता है ।

फिल्म के लेखक ने चारों कहानियों के बहुत ही बुद्धिमता से समाज के दोष, समाज के दृष्टिकोण ,मानव के संमझ के फेर को रखा है ।उनके जीवन की मूर्खता ,विपदाओं के  पर प्रकृति के नियमो को समझाया है और अंत में एक ट्विस्ट के द्वारा एक महत्वपूर्ण संदेश देता है 

" सृष्टि में हर मनुष्य एक दूसरे से जुड़ा है प्रत्यक्ष रूप में या अप्रत्यक्ष रूप में ।इस नियम को मानकर जो चला वही   प्रकृति के नियमों संग है और तभी दुनिया का संतुलन है ।हर चीज़ की हद होती है और हद से बाहर हर चीज़ विनाश की शुरुवात " 

फ़िल्म के तर्क आपको एक अलग स्तर के चिंतन में ले जाते है । मुझे तो देख कर आश्चर्य हुआ कि किस मामले में हम हॉलीवुड से पीछे मानते इंडियन सिनेमा को ?

ऑस्कर की माँ की आंख 
बेस्ट फॉरेन फ़िल्म केटेगरी में आने वाली फिल्मों को समझना उन गोरी चिमड़ियों के बस की बात नही इसीलिए ऐसी फिल्में गुमनाम रह जाती । एक और बात एक बार विक्रम वेदा देखिए और फिर सुपर डीलक्स दोनों में तुलना कीजिये सुपर डीलक्स के शिल्पा बने विजय सेतुपति की और वेदा बने विजय सेतुपति की तब कहीं जा कर विजय का इतना नाम क्यों है का आंकलन हो पायेगा।

इस समय सभी के दिमाग की बत्ती बिना मेंटोस खाये जलेली है इस लिये बहनों और उनके भैया लोगों इस फ़िल्म को लगे हाथों देख ही डालो ।

(तमिल में समझना मुश्किल नेटफ्लिक्स पर इंग्लिश सबटाइटल संग है देख लीजिए ।हिंदी में आएगी तो मस्त होगी )

और हाँ अंत ये बोलने से न चूकना तमिलियन बुद्धि गज़ब की होती ,गज़ब की 

****.* /*****

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

thereader

लुटेरा

कनखजूरा