रूही फ़िल्म समीक्षा




बॉलीवुड स्क्रिप्ट के मामले में कब क्रिएटिव होगा ?

मैंने कोई फ़िल्म नही बनाई है पर खाना बनाया है जल्दबाज़ी में भी ,कम सामान संग भी और कम समय में भी ....क्योंकि में वो अपने घर वालों के लिए बनाती इसलिए किसी भी तरह से बनाऊ स्वाद और स्वास्थ्य के लिए अच्छा बना पहली कोशिश यही होती ।अब आप बोलोगे फ़िल्म समीक्षा और मेरी पाक कला का क्या सम्बन्ध ?

बताती ....
जिस तरह घर के लिए अच्छा खाना बनाकर परोसना मेरा व्यवसाय नही कर्तव्य है इसीलिए उसमें स्वाद होता ही होता सभी मसालों की संतुलित मात्रा के साथ उसी तरह से जब एक निर्देशक एक स्क्रिप्ट राइटर व्यवसाय से इतर सोच फ़िल्म बनाएगा लिखेगा तभी हर बार कहानी नई और पकड़ वाली होगी ।जब दिमाग में व्यवसाय का समीकरण चलेगा
तब तो फार्मूला पुराना रख कर ही आंकड़े बदले जाएंगे ताकि लाभ निकल आये फिर चाहे मनोरंजन जाए भाड़ में।

रूही फ़िल्म की स्क्रिप्ट शायद स्त्री फ़िल्म की सफलता का खुमार उतरने से पहले दिमाग में आ गयी तभी स्त्री वाले कटोरे में बासी दाल को तड़का लगाकर दर्शको के सामने परोसने की कोशिश की गई है।आप खुद सोचिए जिसकी स्क्रिप्ट का नाम बचकाना था रूहीअफजाना (शायद पहले रूहअफजा था) और जिसके प्रदर्शन के साल आगे बढ़ने के बाद भी न बदला गया उसकी स्क्रिप्ट क्या होगी ?

फ़िल्म maddock फ़िल्म (स्त्री फेम प्रोडक्शन हाउस)के बैनर तले बनी है और 70% शूट होने के बाद शायद स्त्री के निर्देशक अमर कौशिक को हटा हार्दिक मेहता को निर्देशन दे दिया गया और ये कदम फ़िल्म को और ले डूबा हलांकि अमर कौशिक स्त्री के बाद बाला में भी कोई स्पार्क न दे पाए फिर फ़िल्म की गति निर्देशकों की अदला बदली का सबूत देती है।

फ़िल्म में एक गाँव मुजीराबाद है जहां बिहार के लड़कों को अगवा कर शादी करवाने की प्रथा को बदल गांव की लड़कियों को अगवाकर जबरन विवाह करने की प्रथा को पकड़ी शादी के रूप में दिखाया गया है। भंवरा(राजकुमार राव) और क़तन्नी(वरुण शर्मा) इसी गांव के दबंग आदमी के न्यूज़पेपर के लिए रिपोर्टर कैमरामैन ,लाश खबर सब है।दंबग शकील(मानव विज) शादी के लिए लड़कियों को अगवा करने का काम भी करता है ।परस्थितियों के चलते शकील ,भंवरा और क़तन्नी से बीमार रूही (जहान्वी कपूर) का अपरहण करवाता है जहां क़तन्नी और भवँरा दोनों रूही के दूसरे रूप से मिलते है ।क़तन्नी को रूही पर कब्ज़ा की चुड़ैल से प्रेम हो जाता तो वहीं भंवरा को रूही से ।अब कहानी यही की क्या चुड़ैल रूही को छोड़ कर जाती है ? क़तन्नी और भवँरा में से किसका प्रेम उसे मिलता है ?

स्त्री , नाले बा जोकि  कर्नाटक की एक कुछ हद सत्य कथा पर बनी थी इसीलिए कहानी में पकड़ थी हास्य था और सवाल छोड़ता एक रोचक अंत भी पर रूही ....???...रूही क्या है ? बेसिरपैर की खुद की बनाई एक urban legend

एक चुड़ैल है कहाँ से आई ,क्यों शादी करना उसकी प्यास है?क्यों वो रूही को ही पकड़ती बाकी दुल्हनों को नही और हां ये चुड़ैल बड़ी ढीठ है मंदिर में भी इसका कुछ न होता बाकायादा सब को दौड़ती है वाह

मध्यांतर के बाद ,निर्देशक अचानक  से शादी को पगलाई चुड़ैल के द्वारा नारी शक्ति ,स्वतंत्र जीवन सशक्तजीवन का संदेश देने लगते और अंत तो क्या था ? एक जगह आ कर लगा खींच तान कर फ़िल्म को खत्म कर ये कह निर्देशक ने अंत कर ही दिया ।फ़िल्म एक ऊर्जा के साथ शुरू होती जो बीच में एक दम से कम हो जाती और यही से लगता है कि अमर ,हार्दिक बन गए।

राजकुमार राव का अपना एक पोटेंशिअल है जिसे निर्देशक जिस तरह से चाहे इस्तेमाल कर सकता और तभी कलाकार की और निर्देशक की दोनोंकी खूबी उभर कर सामने आती पर यहां अमर मतलब हार्दिक ये करने में नाकाम रहे है इसलिए बेचारे राजकुमार भी टाइप्ड लगे same role करने में । जहान्वी के लिए मैं जरूर कहूंगी कि वो सारा अली खान से बेहतर है क्योंकि सारा ने लव आजकल 2 में बिना मेकअप कर हम दर्शकों को जितना डराया था उतना तो जहान्वी मेकअप संग भी न डरा सकीं हमे ।जहान्वी के लुक्स से ज्यादा निर्देशक को उनकी आवाज़ से उभारने की कोशिश करना चाहिए क्योंकि बस  दो प्रोमो सांग में जहान्वी कुछ भाव ला सकी है बाकी फ़िल्म में वो भाव शून्य थी ,है और रहेंगी । वरुण बेचारा क्यूटनेस के लोड का मारा एक फ़िल्म में तो हम वरुण को ग्रे शेड में देखना चाहेंगे ....कोई तो इस बात पर धयान दो ।बाकी कलाकार गीत संगीत लोकेशन सब सामान्य ।भूत वाला मेकअप से स्पेशल इफ़ेक्ट सब बकवास । एक बार देखने पर हास्य संवाद पर हंसी आएगी दुबारा के लिए हास्य बैकग्राउंड लेना पड़ेगा ।

रूही को फीमेल जानी दुश्मन का स्त्री वाला चोंगा कहे तो बेहतर होगा।फ़िल्म के निर्माता निर्देशक जिसने भी प्रदर्शन से पहले इसका नाम रूहअफजा से बदल रूही कर दिया उसको शुक्रिया वार्ना कसम से नाम ही मिठास की दस्त लगा देता ।

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टिप्पणियाँ

BIRDEYE ने कहा…
बहुत सटीक विश्लेषण । ये सच है कि जब तक राइटर्स सिर्फ व्यावसायिक तौर पर लिखते रहेंगे टैब तक उनकी क्रिएटिविटी बाहर नही आएगी । वो वही घिसे पीते पुराने फॉर्मूले को भुनाने की कोशिश करते रहेँगेव। इन सब से इतर अब उन्हें कुछ नया सोचना ही होगा वरना ये सब हाशिये पे चले जायेंगे ।
बहुत ही सटीक विश्लेषण
बेनामी ने कहा…
Good
प्रमेश साध ने कहा…
बहुत ही सटीक विश्लेषण । ये सच है कि व्यावसायिक होड़ के चलते राइटर्स की क्रिएटिविटी खय्याम होती जा रही । जब तक ये पैसों का चश्मा आंख से हटा के अपनी प्रतिभा को उकेरेंगे नही तब तक ऐसी बासी कढ़ी ही परोसते रहेंगे ।
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