श्रद्धांजलि एक कलाकार को (इरफान खान पुण्यतिथि विशेष )
" अरे मेरी अँखियों पर मत जा तेरी माँ कहती थी कि आपकी आंखे बड़ी रसीली है" अंग्रेज़ी मीडियम का ये एक दृश्य इरफ़ान के हल्के फुल्के वाले कॉमेडी अंदाज़ में बोले हुए शब्द
लॉक डाउन में भी मैं मुस्कुरा पड़ी और माँ से बोली "अभी इरफ़ान पूरी तरह ठीक न हुए है वरना इस फ़िल्म के लिए मीडिया में जरूर आते और आज ठीक 15 दिन बाद ये सुनती की अब इरफ़ान हमारे बीच कभी नहीं आएंगे ।
इरफ़ान का TV से फिल्मों तक आने का सफर बहुत कठिन और लंबा था उसी तरह एक एक प्रशंसक के दिल में उनके लिए प्रेम भी उतना गहरा है ।
मैं इस तरह दुखी इससे पहले जगजीत सिंह जी मृत्यु पर हुई ।इरफान से भी वही रिश्ता था एक फनकार एक अदाकार और मैं और रिश्ता दर्द का ।
वैसे तो चंद्रकांता सीरियल के सोमनाथ बद्रीनाथ की दोहरी भूमिका में इरफ़ान को जाना पर पहली बार उनको सलाम बॉम्बे में मैंने नोटिस किया।भूमिका थी लेटर राइटर की और उस भूमिका के इरफान की वही बोलती आंखें .......सच अंग्रेज़ी मीडियम का यह डायलाग याद रहेगा "थारी आंखें बड़ी रसीली है"
तब गूगल पर किसी अभिनेता को ढूंढा आज के जितना आसान न था इसलिए इरफान की बस आंखें याद और अभिनय फिर मैने इरफान को चन्द्रकान्ता में देखा तब पता चला ये इरफ़ान खान है ।
तीसरी पहचान इरफान से हुई हासिल फ़िल्म से ।ये फ़िल्म इरफान के लिए भी खास थी और हर प्रयागी के लिए भी क्यों कि इस फ़िल्म की अधिकांश शूटिंग प्रयागराज में और इलाहाबाद विश्यविद्यालय में हुई थी ।फ़िल्म देखी और इरफ़ान को देखा ।ये फ़िल्म इरफान के लिए भी खास हो गयी क्यूंकि इस फ़िल्म के लिए इरफान को बेस्ट एक्टर इन अ नेगटिव रोल का फ़िल्म फेयर और शायद ये इरफ़ान का पहला अवार्ड था ।उसके बाद शायद इरफ़ान को रफ्तार मिली और जिस रफ्तार काल की क्रूर गति ने आज पूरी तरह थाम दिया।
इरफ़ान का जहां सब नोटिस करते थे मुझे उससे अलग इरफ़ान को नोटिस करना अच्छा लगता था ।2004 की फ़िल्म रोग में एक मृत मॉडल से प्रेम करने वाला पुलिस वाला मुझे बहुत पसंद आया था अब इरफ़ान की आंखों के साथ आवाज़ भी उनके किरदार में अहम लगने वाली थी और यही जादू पान सिंह तोमर के किरदार में चला फिर वो चाहे पान सिंह तोमर को खुद को बताने का अंदाज़ हो या हो ये कहना कि बीहड़ में बागी मिलते है डाकू तो सं**द में होते है"
और इसी फिल्म ने इरफ़ान राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुंचाया ।
जब मैंने तलवार मूवी के अश्विन(इरफ़ान CDI के जॉइंट कमिशनर की भूमिका में) को अपनी पत्नी(तब्बू ) के गोद में सर रख कर रोते देखा (विभागीय राजनीति के चलते हटाये जाने पर) तो इरफ़ान से ज्यादा अश्विन कुमार नज़र आया।
इस फ़िल्म में आरुषि मर्डर के बाद सबसे अलग कुछ था तो वो था इरफान का अभिनय ।कई कई बार क्लोज़र रिपोर्ट पर बहँस के उस सीन पर लिखते लिखते रह गयी लेकिन वो सीन मेघना गुलज़ार के डायलाग संग इरफान की अदाकारी के लिए याद है मुझे ।
फिर मैं इरफान से मिलती रही कभी लंच बॉक्स में कभी ब्लैकमेल में कभी रोग में कभी लाइफ ऑफ पाई में कभी हिंदी मीडियम तो कभी करीब करीब सिंगल में ।
इरफ़ान के अभिनय जितना दमदार होता जा रहा था उनके सहकलाकारों में श्रेष्ठ लोगों का नाम जुड़ता जा रहा था ।पीकू में दीपिका संग ,जज़्बा में ऐश्वर्या ,करीब करीब सिंगल में पार्वती हो या अंग्रेज़ी मीडियम में करीना संग।
सब इरफान के संग काम करना चाहते थे । मैंने 2018 में कारवां देखी ।पूरी फिल्म देर रात तक जागकर देखी वजह थी साधारण कहानी को खूबसूरत बनाती ooty की शूटिंग और इरफान की हल्के फुल्के अंदाज़ वाली हास्य अदाकारी ।
जैसे जैसे इरफान अपने अभिनय की छाप छोड़ते जा रहे वैसे हम चाहने वाले उनको एक अवार्ड देने की हसरत दिल में लिए जीने लगे कि कब 300 400 फ़िल्म कर चुके इरफ़ान को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड मिलेगा जब पर्दे पर उनकी उपस्थिति में उनकी एक बेहतरीन फिल्मों के सीन को दिखा कर बोला जाएगा कि भारतीय सिनेमा में अपने अमूल्य योगदान के लिए जाने जाते अभिनेता इरफान को इस साल का लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिय्या जाता है पर ये क्या 2018 में ही खबर आई कि किस्मत ने अदाकारी निभानी शुरू कर दी है इरफान के जीवन में।
नही बिल्कुल नही
इरफान हम आपके इस अभिनय को नही सराहेंगे नही बिल्कुल नही ।कैसे हार सकते है आप मौत से जीतने के जिंदगी के इस अभिनय में ?
कैसे हार सकते है आप कैसे ????
आप ही ने 2016 में अपने नाम के आगे से खान हटा कर कहा था कि आप चाहते है कि आपका काम उन्हें परिभाषित करे, न कि उनका वंश ।यही सच आज आपके प्रशंसको की आंख से आंसू बन निकल रहा है कि उन्होंने एक अभिनेता को नही एक अच्छे इंसान को भी खो दिया।
ऐसी सोच वाला इंसान बिना लाइफटाइम अचीवमेंटअवार्ड लिए नही जा सकता है बिल्कुल नही
लगता है अभी मौत के इस अभिनय से निकल कर आप कहेंगे कि प्यार था अपनो का इसलिए मौत ने भी वापस आने दिया वरना मौत की जिद ने किसे छोड़ा है।
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