गुड़गांव फ़िल्म


"गारेंटी तो यहाँ किसी की नही ,न तेरी न मेरी"

मैं यहाँ गुरुग्राम की नही ....गुडगाँव मूवी की बात कर रही हूँ ....मूवी जहाँ से शुरू होती है मैं भी गुडगाँव को उसी से शुरू करती हूँ अपनी बातों को .......नदी में डूबी एक कार निकलती है बेक ग्राउंड "जो पाया वो कोई पाया , जो न पाया वो गयो जान से" ......एक शहर जो अपनी नब्ज़ खो चूका है जीने की ,रिश्तों में प्रेम की और इंसानियत की ....यहाँ की दलदल में जो डूबा वो उबरा जो तैर गया वो गया जान से ......कहानी फ़्लैश बेक में चलती है और इतनी wisely चलती है की दर्शक का एक वर्ग ही लिंक हो पता है वर्तमान और भूत में ......फिल्म इतनी ज्यादा यथार्थ है की कहीं कहीं बहुत स्पष्ट है और कामर्शियल सिनेमा मतलब फुल नौटंकी ...

kehri singh(पंकज त्रिपाठी) gurgaon के माने हुए बिल्डर हैं उनकी एक जमीन है gurgaon में जो उन्होंने अपनी बेटी प्रीतो (रागिनी खन्ना ) के ऑफिस के लिए रख छोड़ी है और एक दिन प्रीतो इसी जमीन के नाम पर 
किडनैप हो जाती है ...फिर शुरू होता है रिश्तों और विश्वास का खून होना ....और फिल्म का अंत ,वो एक ट्विस्ट पूरी फिल्म को अचनक एक गति दे सब को रोक देता है हर इंसान स्तब्ध हो जाता है ....फिल्म सिर्फ gurgaon एक अमीरों का सच ही नही कहती ..फिल्म इस शहर के हर लय को ,हर ताल को ,हर बेसुरे को पकडती है ....सट्टा का वो खेल जहाँ निक्की (अक्षय ओबरॉय ) अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध १ करोड़ का सट्टा युवराज की सेंचुरी पर हारता है ......स्पा की आड़ में कॉलगर्ल संग बात लेता निक्की ....प्रीतो का अतीत और लड़कियों को जन्म के समय मारना .......टोल नाके पर लड़ते अमीरों के लड़के ........gurgaon की अमीरी के दुसरे पहलु से निकला किडनैपर जोंटी जो २५००० के खवाब के लिए अपरहण करता है और तीन करोड़ की कल्पना तक न पहुँच ५ laakh ही सही सोचता है .....सरकारी मुलाजिम कालरा जो gurgaon में अमीर बनने आये गरीबों की नब्ज टटोल कर नब्ज ही दबा देता है ....हर सीन ,हर भाव ,हर संवाद इतना कुछ कहता है की समझ के आप gurgaon को जी लेंगे ....वो दृश्य जहाँ किडनैपर प्रीतो के सपने को ले एक सवाल पूछता है की " पार्क के लिए पानी कहाँ से लाओगी" ..ये दृश्य एक पल को सोचने पर मजबूर करता है कि महानगर में पत्थरों की गगनचुम्बी ईमारत में हवा पानी का अस्तित्व महत्व क्यूँ नही समझ रहे लोग ...........शंकर रमण gurgaon के सच को हर तरह से नंगा करते हुए भी एक साफ़ सुथरी फिल्म बनायीं है (शयद बादशाहो में सनी के अटते ज्यादा शर्म महसूस होगी बच्चों संग ) .....पंकज त्रिपाठी kehri singh को समय सीमा के साथ जिया ...जब kehri singh गरीबी से जूझता मजबूर वो अलग नज़र आता है शराब में डूबे अमीरी और औलाद से थके kehri singh से ...ये वेरिएशन पंकज सर ने बखूबी दिखाया बिना बाल रंगे या आँखों के नीचे काले गड्ढे लाये हुए ......टूटता kehri झुकता चला जाता है और मज़बूत होता जाता है एक अभिनेता इसे जीते हुए वो हैं पंकज त्रिपाठी जी .......अक्षय के लिए ये फिल्म जरुर कैरियर चेंजर साबित होगी ...पैसे में डूबे और घर से दूर होते युवा के नकारत्मक पक्ष को अक्षय अच्छे से उभारतें है ....विश यू गुड लक अक्षय ...रागिनी खन्ना के लिए बहुत अधिक कुछ नही था पर फिर भी ऐसी फिल्म का हिस्सा होना ही महतवपूर्ण है .....पब में गिटार बजाने वाला युवा जो बेवजह इस अपरहण का हिस्सा हो जाता है आनंद मूर्ति ......श्रीनिवासन सुंदर राजन आनंद मूर्ति के किरदार में हैं ये पेशे से वैसे राइटर डायरेक्टर हैं यहाँ एक एक्टर ..गर्ल्स शायद इन्हें गूगल पर इनके भोले पण के लिए जरुर सर्च करेंगी लाइक मी ......कर्मा देवी गरीबी से अमीरी में,पाप से पुण्य में हर पल kehri singh की साथी ....चुप रहती या बोलती तो कोई सुनता न एक ठेठ हरियाणवी औरत ....शालिनी वत्स ने कर्मा देवी को परदे पर उतारा .....बाकि कलाकार ने सब ने ठीक ठाक काम किया ....निर्देशन ,कहानी के बाद सबसे आकर्षक ,प्रभावी रहा वो है फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जो रोमांच पैदा करता है और छायांकन जो गुज़रे हुए gurgaon को नया सा दिखाता है नदी से डूबी हुयी कार का निकलना , कूड़े के आस पास बैठे पंछी में से एक पंछी का उड़ना , खून के छींटों se सना चेहरा kehri को इंसान से जानवर में बदलता दिखाता है .......छायाकन ने डायरेक्टर के शब्दों को मूक हो प्रतीकत्मक रूप में बोला और खूब बोला .....प्रीतो एक सुलझी हुयी लड़की है पर चोट खायी प्रीतो भी बेटीचो...... गाली तक उतर अआती है ......gurgaon में एक सन्देश भी बात में माँ बहेन की गाली संग ,नवजात बेटी की हत्या दिखा ....स्त्री सम्मानिये है वो चुप है पर सब बदलती है ये फिल्म का रोचक अंत बताता है .....बड़े बड़े स्टार कास्ट में 

दबी आधी पौनी कहानियों से ऊबे दर्शक इस फिल्म को एक ताजगी रूप में देखें ....

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