gulmohar
पता नही आपके साथ हुआ या नही पर मेरे साथ हुआ.... ख़ासकर माँ नें इस बात का मज़ाक बहुत बनाया कि मैं अडॉप्टड हूँ अनुराग कि सगी बहन नही ज़ब कि ये बात उस छोटी सी अमृता या गुड़िया को इतना असुरक्षित कर जाती थी कि मैं गुस्से में चिल्लाने लगती.... माँ हंसती रहती पर पापा गले लगा चुप कराने लगते।
ये किसी भी बच्चे के न भरने वाला घाव होता ज़ब उसे पता चलता कि वो जिन्हे माता पिता मानता वो उसके जन्मदाता नही.... ऐसे ही कुछ पारिवारिक ताने बाने बुनी फ़िल्म फ्राइडे को हॉटस्टार पर स्ट्रीमिंग हुई... नाम " gulmohar "
मैंने इसका ट्रेलर नही देखा पर इसका होली सांग शेयर किया जोकि काफ़ी हद तक दिल्ली 6 के ससुराल गेंदा फूल कि याद दिला देता........ स्टार कास्ट भी अच्छी..... शर्मीला टैगोर, मनोज बाजपेयी, अमोल पालेकर, सिमरन, विनोद नागपाल, तलत अज़ीज़ और भी बहुत कलाकार जो नामी न पर अच्छे ❤️
फ़िल्म कि कहानी कुसुम ( शर्मीला टैगोर ) के अपनी कोठी बेचने से शुरू होती जिसका विरोध उनका बेटा अरुण (मनोज बाजपेयी )करता.....इससे नाखुश है पर उसका स्वभाव नही किसी पर मर्ज़ी थोपना..... अरुण जानता कि वो कुसुम का दत्तक पुत्र है फिर भी बहुत अपना पन रखता बिना शिकायत के...... घर कि बाक़ी उलझनों को सुलझाते 2 अरुण कि पत्नी इंदिरा ( सिमरन ) को कुछ पेपर्स मिलते जिन्हे पढ़ अरुण फिर वहीं पहुंच जाता जहाँ कभी अनाथ अरुण था........ रिश्तों के उतार चढ़ाव और मानवीय स्वभाव में खिंचते बंधते अंततः होली के दिन सब एक हो जाते।
निर्देशक रवि चित्तेला कि दो घण्टे दस मिनट कि फ़िल्म यूँ तो बहुत सामान्य विषय को लेकर चलती पर ये समान्य विषय भी हर घर कि कहानी...... उम्र के अंतर से आने वाले वैचारिक भेदभाव, समझौते कि डोर से बंधते रिश्ते जो कभी कभी जबरदस्ती के लगते...... इतने सामान्य कि दर्शक इसमें खुद को ढूंढ़ते 2 रोने लगता ( मैं खुद रोई सुबुक सुबुक के 😭) शायद इसीलिए फ़िल्म IMdb पर 8.2 rating ले गयीं।
कलाकरों में शर्मीला टैगोर कि वापसी अच्छी लगी...... लगता है बे अदब पोतों से ऊब गयीं है......... मनोज बाजपेयी... हाय ये बंदा है तो हीरा.... हर चरित्र में जान डाल देता....... अब गुलमोहर के मनोज में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के मनोज को ढूंढ़ कर दिखाईये....... लगता ही न कि दोनों को निभाने वाला मनोज एक ❤️........ सिमरन में उम्र कि परिपकवता आयी है उफ्फ्फ..... उन में भी हमे आँख मारे गाने वाली सिमरन न मिली 😊........... अमोल पालेकर जैसे नकचढ़े लगते उम्र में आकर वैसा ही किरदार भी मिला.....बाकि कलाकारों नें भी काम अच्छा किया पर यहाँ लिखने से बेहतर आप फ़िल्म में देखो गीत संगीत साधारण पर बोल परिस्थितियों के हिसाब अर्थपूर्ण और मार्मिक....... सुनते सुनते या होली के शबाब के चलते " मिल गए होली में " गीत प्रसिद्धि बटोर लेगा।
फ़िल्म यही कहती कि रिश्ते अपने खून या पराये खून से नही निभाए जाते.... रिश्ते निभाये जाते समझ और प्रेम के बड़े होते दायरे के संग.... बस जी एक शिकायत अंत में कि ये बिटिया अमृता को समलैंगिक दिखाना जरुरी था क्या 😡😡😡😡😡..... आप लोग तो मेरा नाम पूरा मिट्टी में मिला दिए....... 😏 ( ऊपर से निक नेम भी अम्मू..... 🤦🏻♀️ हद है )
3/5 एक मनोज के लिए....... दूसरा बाक़ी स्टारकास्ट के लिए...... तीसरा निर्देशक और कहानी के लिए........ है must watch वाली फ़िल्म
टिप्पणियाँ
सबको पसंद आना मुश्किल ,
कुछ देर देखकर छोड दिया था
फिर से देखते हैं