गाँधी गोडसे : एक युद्ध
गांधी गोडसे :एक युद्ध
बॉलीवुड और राजनीती का चोली दामन का साथ होता जा रहे…न सिर्फ स्क्रिप्ट में बल्कि गतिविधियों में भी.. अब आप बोलेंगे वो कौन सी नई बात….. दाऊ वूड ऐसे ही थोड़े न बोलते इसे…ये तो बहुत पुरानी बात हो रही है।
बिलकुल सही….. पर पहले थोड़ा शर्म और काबिलियत बाक़ी थी पर अब ये दोनों ही लुप्त है इसलिए ये एक तरह से सत्य पर मेरे गलत प्रयोग साबित हो रहा है।
बीते साल रेडिओ मिर्ची पर साल कि सबसे बेहतरीन फ़िल्म चुप का विज्ञापन सुना तो पता चला कि बॉलीवुड में कुछ अच्छा भी हो रहा है….. इसी तरह रेडिओ पर ही गाँधी गोडसे : एक युद्ध फ़िल्म का पता चला जोकि 26 जनवरी 2023 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई है। फ़िल्म गुपचुप प्रदर्शित हुई नहीं कह सकते पर शायद निर्माता राजकुमार संतोषी स्क्रिप्ट का विषय कितना जवल्नशील ये जानते हुए डर गए कि कहीं विवाद फ़िल्म का प्रदर्शन ही न रुकवा दे पर फिर भी राजकुमार संतोषी को एक बात पर बधाई दूंगी कि फ़िल्म पठान के साथ रिलीज कि और फ़िल्म चर्चा में भी आ गयी। बधाई संतोषी जी 🙏
राजकुमार संतोषी को हम से 1990 कि फ़िल्म घायल से जानते जबकि राजकुमार का पहला काम था फ़िल्म अर्ध सत्य में सह निर्देशक के तौर पर फिर विजेता फ़िल्म में वो श निर्देशक रहें है……. मैं राजकुमार संतोषी कि प्रशंशक थी पर ज़ब ये सुना कि वो अभिनेत्री मीनाक्षी शेषद्रि के प्रेम में पागल हो उन्हें विवाह प्रस्ताव भी दे दिया तब से थोड़ा इन्हे नीचे कि सीढ़ी पर रख दिया….. अरे भाई आप राजकुमार संतोषी है रामगोपाल वर्मा नहीं….. समझें न 😏
अगर देखें तो राजकुमार संतोषी नें सतत बॉलीवुड को अच्छी अच्छी फिल्मे दी जिनमे प्रमुख है घायल, घातक, अर्ध सत्य, चाइना गेट, पुकार, दामिनी, लज्जा,खाकी और लीजेंड of भगत सिंह….. No doubt बंदा टैलेंटेड है और इसी उम्मीद के साथ मैंने गाँधी गोडसे देखी वरना तो हम हाथ भी न लगाते 🤣🤣
अब आती हूँ फ़िल्म पर
फ़िल्म शुरू होती विभाजन के समय से……इस 25 मिनट कि स्क्रिप्ट पर मैं कोई बात न करुँगी क्यूंकि यहाँ मैं भर भर के लोटा अनूप जलोटा ( मज़ाक है 😏) राजकुमार संतोषी से खफ़ा हूँ….. गट्स का गोटियाँ खेलने लगे 😡😡
अब आते है गाँधी निर्वाण पर….. सोचिये कि गाँधी जी गोडसे कि गोली से निर्वाण को प्राप्त न होते जीवित होते तब देश कि और गोडसे कि सोच और जीवन कि क्या स्तिथि होती यही तुलनात्मक विवरण है ये फ़िल्म।
गोडसे गाँधी पर गोली चलाते है और गाँधी बच जाते है 15 दिवस कि अस्पताल कि सेवा के बाद…. इसके बाद गाँधी सबसे पहले गाँधी कांग्रेस पार्टी को खत्म करने कि बात करते जिस पर नेहरू, मौलाना, पटेल साहेब और अम्बडेकर साहेब असहमति बना कर कांग्रेस आई को पार्टी को चलाते….. तो गाँधी इनसे अलग हो गाँवों को विकास के दुश प्रभावों से बचाने के लिए स्वयं और अपने शिष्यों के साथ एक आंदोलन चलाते है दूसरी तरफ गोडसे को माफ़ कर उसकी सज़ा फाँसी से कैद में बदलवा देते।
देश आगे बढ़ रहा पर गाँधी के सिद्धांत पीछे हो रहे जिसके चलती राजनीती और लोगों में उनके लिए वो जगह नहीं रहती और यहीं से उनके विरोधी पैदा होते जो उनकी हत्या करने प्रयास करने लगते……. उधर गोडसे जेल से ही लेखन करने लगता……. विरोध के चलते गाँधी और उनके समर्थको को सरकार को जेल में डालना पड़ता है जहाँ गाँधी गोडसे वाले जेल में ही गोडसे के साथ रहने कि इच्छा दिखाते है……सजा के दौरान एक साथ रहते हुए गोडसे और गाँधी एक दूसरी कि विचारधारा बदल देते है और गाँधी कि एक शिष्या जो कि गाँधी के सिद्धांतो के मानते हुए अपने प्रेमी से विवाह नहीं कर रही थी…. गोडसे द्वारा दिए गए बदलावो के चलते गाँधी जेल में ही उस शिष्या का विवाह करवाते है…. विवाह समारोह में गाँधी पर विरोधियो द्वारा हमला होते है जिससे गोडसे गाँधी को बचाते है और इसके बाद गाँधी और गोडसे कि रिहाई हो जाती जेल से पर ये क्या??
बाहर आ कर गाँधी गोडसे देखते कि उन दोनों नें तो एक दूसरे कि विचारधारा अपना ली पर देश गाँधी और गोडसे समर्थकों में बँट कर लड़ रहे।
देखा जाय तो इस विषय पर इससे अलग और अच्छा नहीं परोसा जा सकता क्यूंकि फ़िल्म गाँधी गोडसे के समर्थकों दोनों को देखनी और बुद्धि बंद कर देखनी है तो स्क्रिप्ट बहुत ही चालाकी से लिखी पर फ़िल्म माध्यतर के पहले विषय विहीन लगी है ज़ब गाँधी और गोडसे एक साथ जेल में होते तब का उनका जो वाद विवाद है वो देखने योग्य बाकि समझना न समझना दर्शकों कि बुद्धिहीनता या बुद्धि पर निर्भर करता।
मुझे आपत्ति है कि निर्देशक नें बतौर लेखक कहीं कहीं पक्षपात किया क्यों पता नहीं पर अनुचित है
मैं तारीफ न कर रही पर गोडसे नें गाँधी जी को अपशब्द नहीं कहे थे….. उनको ले उनकी भाषा शैली बचकानी न थी इससे निर्देशक बच सकते थे पर निर्देशक नें जो अंत दिखाया और कस्तूरबा कि आत्मा का गाँधी से संवाद वो काबिले तारीफ था।
अब आते अदाकारी पर तो गोडसे कि भूमिका में चिन्मय मंडलकर से आप मिल चूके है याद है न बिट्टा कश्मीर फाइल्स में जिसे देख बस नफ़रत हुई….. चिन्मय मंझे हुए कलाकार है और अपनी भूमिकाओं को लेकर प्रयोगधर्मी भी है उनसे जितना कहा वैसा किया इसलिए कोई शिकायत न बाक़ी कलाकारों में नेहरू बने पवन चोपड़ा के सिवाय किसी को पहचानना मुश्किल…. पवन crime petrol और कई फिल्मो में पुलिस कि भूमिका खूब निभाएं है……छोटी सी भूमिका में आरिफ जाकरिया भी है…..दीपक अंतनी गाँधी बने है…. उनकी कोशिश अच्छी है पर नवजवान को वृद्ध कितना देखा सकते?
गाँधी कि शिष्या कि भूमिका में राजकुमार संतोषी अपनी बेटी तनीषा को भी नेपोटिस्म के नाम पर ला दिए…. Bad very bad 😏
कुल मिलाकार थोड़ी शिकायतों संग राजकुमार संतोषी का ये प्रयास संतुलित है समझ के अपने अपने प्रयोगों संग 😊
(Rating न दूंगी आप अपनी अपनी rating फ़िल्म और लेख दोनों के लिए कमेंट कर बताये….. पर वाद विवाद परिचर्चा कि सम्भावना सेठ यहाँ अनुपस्थित है )
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