लुटेरा
#lootera
ओ हेनरी ...इनकी कहानियां बचपन में "कथासागर" और "एक कहानी " में DD नेशनल पर देखा था I उम्मीद नही थी की ओ हेनरी की कहानी प्रेम को भी इतनी खूबसूरती से प्रदर्शित करेगी ...२०१३ में प्रदर्शित फिल्म "lootera "
कल देखि ...ओ हेनरी की काहानी "THE LAST LEAF" का आंशिक चित्रण ......lootera २०१३ की श्रेष्ठ फिल्मो आती है और ये मुझसे छूट गयी थी ?....lootera आज़ादी के बाद के समय की साधारण सी लगने
वाली प्रेम कथा पर इस प्रेम कथा का होना और इसके नायक नायिका के प्रेम का होना एक आलग अनुभव सा है ........विक्रमादित्य मोटवानी दवरा निर्देशित "लूटेरा" इनकी दूसरी फिल्म है .....विक्रम अपनी पहली फिल्मक"उड़ान " से ही
अपनी काबिलियत दिखा चुके हैं ......निर्देशन एक दम सधा हुआ ...
कहानी शुरू होती है १९५३ के गाँव मानिकपुर से ...एक जमीदार पिता की एकलौती बेटी पाखी (सोनाक्षी सिन्हा ) ,एक अपरिपक्व लेखिका ......ऐसे में एक पुरातव अन्वेषक वरुण श्रीवास्तव (रणवीर सिंह ) आता है ...वरुण जल्द ही पाखी
के पिता और पाखी के दिल में जगह बना लेता है ...अपने मित्र देव (विक्रम मैसी ) के साथ पाखी की हवेली में रहता है ......कला और लेखन दोनों को जोड़ देती है पर वरुण दूर जाने लगता है पर एक घटना वरुण और पाखी की सगाई तय करती है तो वहीँ अगले पल वरुण ,पाखी और उसके पिता को सगाई वाले दिन धोखा दे भाग जाता है ........सदमे से पाखी के पिता भी उसे अकेला छोड़ चले जाते हैं और पाखी इस सदमे के संग मानिकपुर से दूर ......पाखी अपनी लाइलाज बीमारी के संग डलहौजी में वरुण का इंतज़ार करती है और एक व्यसक लेखिका बन खुद को कहानियों में डुबो देती है .....वो वरुण से बदला नही लेना चाहती है वो सिर्फ उसे भूलना चाहती है ....वरुण का गुनाह वरुण को पाखी के सामने ला खड़ा करता है ....पाखी अपने जीवन के अंत समय में है जिसे वो अपने खिड़की के सामने एक सूखे पेड़ पर उम्मीद के हरे पत्ते के साथ जीना चाहती है .....वरुण रोज़ उस पेड़ पर अपनी पेंटिंग से एक हरा पत्ता लगाता है पाखी में उम्मीद जागने के लिए .....अपनी मृत्यु से पहले वरुण पाखी और अपने बीच की सारी गलतफहमी दूर कर लेता है और अगली सुबह उम्मीद का आखिरी पत्ता लगा अपनी मृत्यु लिखता है ........पाखी उस सुबह वरुण और हरे पत्ते का सच जान मुस्कुराते हुए अकेले मृत्यु का इंतज़ार करती है ........ये वो प्रेम नही था जो आकर्षण से शुरू हो ख़तम हो जाता है .......पाखी ने सिर्फ प्रेम किया था और वरुण ने एक छल ....वरुण नही माफ़ कर पता खुद को जब वो अपने छल के चलते पाखी को खुद को सजा देते देखता है ...वो बदलता है पछतावे के साथ पर सब कुछ ख़तम हो चूका होता है ......फिल्म के अंत को ओ हेनरी की कहानी से जोड़ना इस फिल्म का सबसे सुन्दर भाग था ..रणवीर खुद को साबित करते हैं एक लूटेरे वरुण के रूप में ......सोनाक्षी बदलती पाखी के साथ न्याय करती है ......आदिल हुसैन पुलिस ऑफिसर की भूमिका जितनी देर भी थे फिल्म की जान रहे ....पटकथा और संवाद के बाद फिल्म की जान था फिल्म का संगीत .....अमित त्रिवेदी के संगीत ने और अमिताभ भट्टाचार्य के गीत ने अधूरे प्रेम को प्राण दिया ..."संवार लूं ","मन मर्जियां ","जिंदा हूँ " और "अनकही " बेहद खुबसूरत गीत ..........मुझे वो प्रेम कहनियाँ नही पसंद आती जो प्रेम से भरोसा ख़त्म करती है .....भले ही यहाँ छल था ,अधुरा था प्रेम पर प्रेम था तभी वरुण लौटता है ,पछताता है ,बदलता है भले ही फिर अकेला छोड़ जाता है पाखी को ....प्रेम था इसलिए पाखी भी छल वाले प्रेम को जीती है ....प्रेम है इसलिए "लूटेरा " जैसी प्रेम कहानी सूखे ठूंठ पर हरे पत्ते सी उग जाती हैं I
टिप्पणियाँ
इस मूवी से पहले सोनाक्षी को देखना पसंद नही करता था
पर इस मूवी ने वो अनमना पन खत्म किया, हालाँकि उसके बाद भी कोई फ़िल्म देखी नही इसकी, लुटेरा की सोनाक्षी सहेज कर रखना चाहता हूँ शायद...
❤️