anthology films
महामारी की दशाओं के चलते मल्टी प्लेक्स थिएटर सिनेमाघरों का जो हाल है वो किसी से अछूता नही ।
पहले तो भीड़ की वजह से इनसे लोगो को दूर करना पड़ा पर अब ये लोगो की खुद की रुचि से दूर हो गया जब OTT पर एक टिकट के खर्चे पर एक फ़िल्म कितने लोग देख सकते ,बार बार देख सकते और तो और कई देख सकते ।
ऐसे में OTT पर प्रोड्यूसर का प्रयोग धर्मी होना लाजमी है । इसे तरह के प्रयोग का नाम है anthology ।
Anthology को दर्शक के तौर पर समझाऊं तो एक फ़िल्म के समय में अलग अलग निर्देशकों की या कभी कभी एक ही निर्देशक की चार अलग अलग मुख्य किरदार वाली कहानियां जिनका ताना बाना आपस मे जुड़ा रहता या उन चार कहानियों का सब्जेक्ट कॉमन होता ।एक anthology फ़िल्म का एक ही विषय वस्तु एक ही होता जैसे एक anthology हॉरर है यानी चार अलग अलग हॉरर पर आधारित अलग अलग कहानियां या सोशल ड्रामा जैसे सुपर डीलक्स .....सुपर डीलक्स में चार अलग अलग किरदार अपनी परिस्थतियों से जूझते हुए एक दूसरे अंजान लेकिन इनको निर्देशक एक ही सूत्र से बांधता चार अनजान परिस्थतियों को एक दूसरे का पालनहार बना कर ।सुपर डीलक्स सोशल ड्रामा यानी चारो किरदार की सामाजिक दशा को दिखाया।इसी तरह से डार्क ह्यूमर बेस्ड स्क्रिप्ट लूडो फ़िल्म में अनुराग बसु ने सुपर डीलक्स वाला कांसेप्ट ही लिया कि चार अलग किरदरों की विषम परिस्थिति है पर एक कि विषम स्थिति दूसरे की समस्या का हल बन जाती यानी वही दुनिया के खेल में हम सब की शह और मात एक दूसरे जिंदगी का हल है।
Anthology फ़िल्म लस्ट स्टोरीज महिला और सेक्स को लेकर उसकी सोच और सामाजिक परिस्थितियों को अलग अलग चार निर्देशकों दवरा निर्देशित कर चार किरदारों में दिखाया ।
घोस्ट स्टोरीज नाम से जाहिर है भय हॉरर को विषय ले चार कहानियां रखी और चारों के अलग अलग निर्देशक ।
Ray ,हालिया नेटफ्लिक्स रिलीज में anthology के नाम पर दर्शक को बढियां उल्लू रे बनाया। मात्र एक कहानी सत्यजीत रे की ,वो अडॉप्टेड यानी परिवर्तित और बाकी सब बांग्ला लेखकों की कृतियों के ले चार कहानियों को सत्यजीत रे का नाम ले anthology film कह प्रदर्शित कर दिया।चारो कहानियों को सत्यजीत रे का रंग देने के नाम पर इतना धीमे चलाया कि मटक मटक मैराथन में मनोज बाजपेयी,k k मेनन,गजराज राव आदि जैसे किरदार थके नज़र आये ।
Anthology देखनी है तो तमिल में बनी paava kadhaigal यानी पाप भरी कहानियां देखिए ।हिंदी subtitle संग भी आप फ़िल्म की गहराई संमझ जाएंगे । फ़िल्म का intro ही इतना आकर्षक तो कहानियों की क्या बात करें ।उगते सूर्यकी लालिमा से स्त्री के जीवन की हर दशा को गहरे लाल रंग से जोड़ कर जो एनिमेटेड इंट्रो दिखाया वो ही दिल को छू जाता कहानियां तो रुला देती।
पहली कहानी एक हिजड़े की है और उसके भीतर की स्त्री जो प्रेम के लिए जीना जानती पर उसका जन्म जिस योनि में हुआ वो प्रेम पाने के लायक नही ये समाज उसे समझाता ।अंत में वो अपनी नियति से समझौता कर अपने इस जन्म को बलिदान कर देता।
दूसरी कहानी है एक रेप पीड़िता नाबालिग बच्ची की जिसे उसका समाज से तो बचा लेता पर खुद उसकी माँ की निगाह में नही उठा पाता और अंत में उसकी माँ उसे मृत्यु देती है।
तीसरी कहानी है दो जुड़वा बहनों की और रूढ़िवादी सोच वाले पिता की ।एक बहन समलैंगिक होकर पिता से विद्रोह कर खुद स्वतंत्र कर लेती जबकिं दूसरी बहन पिता के हिसेब से चल कर भी ऑनर किलिंग का शिकार हो जाती है।
चौथी कहानी साई पल्लवी और प्रकाश राज अभिनीत है जो बहुत मर्मिंक है ।अंतरजातीय विवाह की पुत्री को अपने खानदान का कलंक मनाने वाला पिता गर्भवती पुत्री को धोखे से बुला बहुत ही दर्द भरी मौत देता है ।
Paava kadhaigal तमिलनाडु के आज के परिवेश में भी स्त्री की दशा और पिछड़ी सोच का प्रदर्शन करती है ।कालिदास जयराम ,प्रकाशराज,साई पल्लवी,कल्कि कोचलिन, सिमरन आदि कलाकरों से सजी ये फ़िल्म बेस्ट anthology film लगी मुझे।
Anthology सिनेमा निर्माताओं के लिए भी काफी अच्छा प्रयोग है ।एक ही बैनर तले चार अलग अलग निर्देशक ,कहानियां हो जाती साथ ही साथ कलाकारों और बजट का बहुत झंझट न होता एक ही शेड्यूल में कम समय में चार कहानियां शूट की जा सकती तो वही दर्शक के लिए भी बहुत रुचिकर भी होती 30 -30 मिनट की अलग चार कहानियां यानी 2 घण्टे में अलग अलग कहानियां देखने को मिलती ।एक बोरिंग फ़िल्म को नही झेलना पड़ता ।एक ही जगह चार निर्देशकों के ,अलग अलग कलाकारों की काबिलियत भी देखने को मिल जाती ।
Anthology film में बस दो चीजों का होना बहुत जरूरी कम समय वाली मजबूत स्क्रिप्ट और उसको और निखारने वाला एक अच्छा निर्देशक ।
अभी देखिए प्रयोगधर्मी सिनेमा बहुत कुछ अच्छा परोसेगा जो दर्शकों के लिए अच्छा होगा वही बदलाव में न खपने वाले बॉलीवुड के लोग राज कुंद्रा से संपर्क करेंगे ☺️☺️☺️
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