कपाल क्रिया
शाम गहराने लगी ...डुबते सूरज संग लोगो की भीड़ भी शमशान से कम होने लगी ।चिता की आग भी लगभग ठंडी होने को ही थी तभी गहरी सोच में डूबे मयंक की तन्द्रा चिता से अस्थि निकालने वाली ने तोड़ी।
"भैया जी भैया जी "
"हम्म हाँ बोलिये " मयंक थोड़ा सकपता सा बोला
"भैया जी हिन्दू रीति रिवाज से दाह संस्कार हो रहा तो क्रिया बाकी रह गयी उसी के लिये बोल रहे"
"क्रिया?.....अब क्या बाकी है अस्थि लेने के अलावा "मयंक ने झुंझलाते हुए कहा
"कपाल क्रिया …..चिता की आग बुझने से पहले पुत्र को मृतक की कपाल क्रिया करनी होती यानी कपाल को डंडे से छिन्न करना होता वार्ना मरने वाले को मुक्ति न मिलती "
"क्या करना होगा ? कपाल को छिन्न क्या?"मयंक ने घबराते हुए पुछा
"रुकिए हम करवा ही देते वरना कर्म कांड वाले हम को बोलेंगे पाप करवा दिए ….."
शमशान की क्रिया करवाने वाले ने मयंक के हाथ में एक डंडा थमा दिया और बोला "इसे कसके पकड़े और चिता के कपाल को फोड़ना है एक प्रहार से ताकि आत्मा को मुक्ति मिले "
"क्या" दबी सी चीख के संग मयंक बोला और उसके हाथों से डंडा छूट कर गिर गया ।मयंक के सामने जैसे अंधेरा छाने लगा ।खुद से बड़बड़ाते हुए मयंक लडख़ड़ाने लगा "कपाल क्रिया …...कैसे करूँ …..एक देह संग दो बार "
ये कह मयंक ज़मीन पर घुटनो बल गिर पड़ा ।रोते रोते आधे अधूरे शब्द लडख़ड़ाती हुई जुबान बस यही बोल रही थी "एक बेटा कैसे दो दो बार कपाल क्रिया कर सकता …..कैसे …..एक जीवित देह संग एक मृत देह संग …...कैसे !!
मयंक की इस हालत संग चिता की आग शांत होने को थी मयंक के अंदर के पाप की चिता को धधका कर
कम हो चुके जीवित शरीरों से मुक्त होता शमशान का सन्नाटा बता रहा था कि कैसे जीवित देह के भीड़ में मृत हो चुकी भावनाएं सुरक्षित है।
मयंक के मृत पिता आत्मा देह से मुक्त हो चुकी हो थी और शायद मयंक को उसके अपराध के लिए क्षमा भी कर चुकी थी पर अब मयंक की अंतरात्मा उसे क्षमा नही कर रही थी …..अब शमशान के सन्नाटे में दो चिता जल रही थी …..एक मृत पिता की जिसकी जीवित कपाल क्रिया कर उसके पुत्र ने उसे मृत्यु दी दूसरी उस जीवित पुत्र की जिसकी आत्मा ऐसा कृत करते समय मर चुकी थी।
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